लखनऊ। शहर में बुधवार को हलछठ का पर्व श्रद्धा व उत्साह के साथ मनाया गया। हलछठ का व्रत माताओं द्वारा पुत्रों की दीघार्यु के लिए रखा गया और विधि-विधान से हलछठ की पूजा अर्चना की गई। हलषष्ठी व्रत में महिलाओं ने सुबह से ही स्नानादि आदि से निवृत होकर नित्यक्रम करने के पश्चात हलषष्ठी व्रत धारण करने का संकल्प उत्तराभिमुख होकर किया। बलराम जयंती पर होने वाले इस पर्व पर हल की पूजा अर्चना होती है।
गौरतलब है कि हलछठ पूजा के लिए एक दिन पहले बाजार में महिलाएं पूजा की सामग्री खरीदती हुई देखी गई। वहीं पूजा के लिए महिलाएं सुबह के समय पलाश, कांस एवं कुश के नीचे भगवान शिव पार्वती स्वामी कार्तिकेय एवं गणेश जी की मूर्ति स्थापित करके धूप दीप पुष्प आदि से भक्तिभाव से पूजन किया। इस दौरान महिलाओं ने ठिंगरिया-मुंगरिया की प्रचलित कहानियां सुनी और कथा का वाचन किया। हलछठ पर्व के तहत बाजार में चहल-पहल रही। पूजा अर्चना के बाद उपवास रखने वाली माताओं ने अपने पुत्रों के दीघार्यु और भलाई की कामना की। घर-घर के आंगन में कुश गाड़ कर रीति के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान किए गए। महिलाओं ने व्रत रख पूजा अर्चना की। मान्यता है कि श्रीकृष्णजी के जन्म से पूर्व श्री बलरामजी का जन्म हुआ था। हलषष्ठी का व्रत बलरामजी के जन्म के उपलक्ष्य में किया जाता है। बलरामजी का शस्त्र हल है।
इसलिए इस दिन महिलाओं को हल चले हुए जमीन में चलना पड़ता है। व्रत के पूजन सामग्री के रुप में दूध, दही-घी, महुआ, तिन्नी का चावल, फूल, दूब, रोली, चन्दन, नारियल, कुश और भाजी का प्रयोग होता है। इसी क्रम में सुबह से ही महुआ और कुश लगाकर व गड्ढा खोद कर महिलाओं ने पूजन-अर्चन किया। पुत्रों को गड्ढे के पानी में पैर डालकर धुला और उनकी लंबी उम्र की कामना की। पुत्रों ने भी माता के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया। इसी तरह घर-घर में भी कुंड बने और दिन भर पूजन-अर्चन का सिलसिला चलता रहा। खाने में बिना जोते खेत के अन्न-फल व अन्य सामग्री का इस्तेमाल महिलाओं ने किया। जिसमें तिन्नी का चावल, दही व करेमुआ के साग की काफी मांग रही।
माताओं ने रखा निर्जला व्रत
राजधानी में हलषष्ठी व्रत उत्साह से मनाया गया। महिलाओं ने संतान सुख प्राप्ति के लिए व्रत रखकर कर विधि-विधान से पूजन किया। पूजन के बाद हलषष्ठी पर्व सें संबंधित कथा कही गई एवं सुनी गई। महिलाओं ने पूजन के लिए गढ्ढा खोदकर सगरी बनाई तथा इसमें झरबेरी, ताश और पलाश वृक्षों की एक टहनी खड़ी कर बांधी। आठ दस दिन पहले बोई गई कजरी तथा सूत की पिंडी रखकर पूजा की। भैंस के घी से दीपक जलाया गया और हवन में भी भैंस के ही घी का उपयोग किया। बधों के दीघार्यु होने की कामना की। हलषष्ठी करने वाली महिलाएं व्रत के दिन हल जोतकर उत्पन्न की जाने वाली किसी भी वस्तु का प्रयोग नहीं करती हैं। पेड़ों से उत्पन्न व स्वयं प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होने वाले छह प्रकार के भोज्य पदार्थ का ही सेवन कर व्रत तोड़ती हैं।
हलछठ माता का किया पूजन
इंदिरानगर में हलछठ पर्व पर पूजा अर्चना करते हुए भारत माता की जय कार करते हुए हर छठ माता की पूजा अर्चना कर महिलाओं ने अपने अपने पुत्रों के लिए लंबी उम्र की कामना की और उनके जीवन में कभी कोई समस्या न हो, धन संपत्ति से संपन्न रहने की कामना की। भोमा गांव में भी हरछठ पर्व पर माताओं ने व्रत रखकर विभिन्न पूजन सामग्रियों से पूजन अर्चन कर अपने पुत्रों की दीघार्यु की कामना की।





