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अवांछनीय आदतें

हमारी अवांछनीय आदतें कष्ट का कारण बनती हैं। आत्म निग्रह में अस्वाद व्रत, उपवास, ब्रह्मचर्य, मौन, सर्दी-गर्मी के ऋतुप्रवाह का सहन, सादगी, मितव्ययता, दिनचर्या निर्धारण और उसका कड़ाई से पालन। जैसी शरीर और मन की पुरानी अवांछनीय आदतों पर रोक थाम के लिए बरती हुई कड़ाई तप के साधना के तितीक्षा वर्ग में आती है। दान, पुण्य, सेवा, सहायता, सामूहिक सत्कर्मो में सहयोग, लोक कल्याण की प्रवृत्तियों में रस लेना और उसके लिए समय, श्रम एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाना। अनीति के विरूद्ध संघर्ष करने में लगने वाली चोटों को सहने के लिए साहस एकत्रित करना। उदारता के कारण अपनी सुविधाओं में कमी के लिए तैयार रहना। इसमें अप्रतिष्ठता एवं संबंधियों के स्वार्थों में कमी आने से उनकी नाराजगी सहने को प्रस्तुत रहना। लोक प्रवाह से विपरीत चलने के कारण उपहार अपमान, विरोध एवं प्रहार की संभवना मान कर चलना और उनका धैर्य पूर्वक सामना करना।

 

इस प्रकार की कष्ट सहिष्णुता तप साधना का दूसरा चरण है। तीसरे तप वर्ग में विभिन्न प्रकार के  साधनात्मक कर्मकाण्ड आते हैं। जप, ध्यान, प्राणायाम, देवपूजा, संध्या अनुष्ठान, पुरश्चरण आदि अनेकों सम्प्रदयों में प्रचलित अनेकों विधि विधान इसी उपासना वर्ग में आते हैं। योग साधना के चार और तप साधन के तीन कुल मिलाकर अध्यात्म के सात सोपान हैं। इन्हीं को सप्तलोक, सप्तऋषि, सप्तमहाव्रत कहा गया है। सप्त द्वीप, सप्त समुद्र सप्त श्खिर, सप्त रत्न, सप्त धातु, सप्त सूर्य किरणें, सप्ताह आदि की संगति इन्हीं सात सोपानों से मिलती है। विभिन्न अलंकारों के साथ इन्हीं सात तथ्यों को मनीषियों ने विभिन्न प्रतिपादनों के साथ प्रतिष्ठिापित करने का प्रयास किया है। आध्यात्म के ज्ञान पक्ष और विज्ञान पक्ष को समझने के लिए जो अनेकानेक शास्त्र पढ़ाने को और विद्वानों के प्रवचन प्रतिपादन सुनने को मिलते हैं, उनमें इन सात महातथ्यों के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। यदि उन्हें सही रीति से समझा और अपनाया जा सके तो मनुष्य में देवत्व का अवतरण हो सकना सुनिश्चित है। विज्ञान पक्ष की साधना में तपश्चर्या को केन्द्र मानकर चलने वाले विधि विधानों का उद्देश्य- प्रसुप्ति से निवृत्ति मूर्छना से मुक्तिद्ध इसके लिए गर्मी उत्पन्न करनी पड़ी है। गर्मी पाकर प्रसुप्ति से मुक्ति मिलती है। सूर्योदय की बेला निकट आने पर प्राणियों की निद्रा टूटती है और वे  जागते उठते एवं कार्यरत होते हैं। रात्रि में कलियां सिकुड़ी पड़ी रहती हैं, पर जैसे ही सूर्य निकलता है वे हंसने खिलने लगती हैं। मानवी सत्ता के अन्तर्गत बहुत कुछ है। अत्युक्ति न समझी जाये तो यह भी कहा जा सकता है कि सब कुछ है। किन्तु है वह मूर्छित। इस मूर्छना को जगाने के लिए धूप, आग, बिजली आदि से उत्पन्न बाहरी गर्मी से काम नहीं चलता।

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