नन्द दुलारे वाजपेयी, गया प्रसाद शुक्ल सनेही एवं वंशीधर शुक्ल स्मृति समारोह
लखनऊ। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ द्वारा नन्द दुलारे वाजपेयी, गया प्रसाद शुक्ल सनेही एवं वंशीधर शुक्ल की स्मृति में सोमवार को एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन हिन्दी भवन के प्रेमचन्द सभागार में पूर्वाह्न 10:30 बजे से किया गया। दीप प्रज्वलन, माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण, पुष्पार्पण के उपरान्त वाणी वंदना डॉ0 प्रीति राव द्वारा प्रस्तुत की गयी। सम्माननीय अतिथि डॉ. कैलाश देवी सिंह, पद्मकान्त शर्मा प्रभात, एवं डॉ. सत्यवान का स्वागत उत्तरीय एवं स्मृति चिह्न भेंट कर डॉ0 अमिता दुबे, प्रधान सम्पादक, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा किया गया। डॉ. कैलाश देवी सिंह ने कहा वंशीधर शुक्ल जी एक कालजयी रचनाकार हैं। शुक्ल जी ने देश की स्वतंत्रता में भी योगदान दिया। वे किसानों की समस्याओं के निराकरण के लिए भी अपनी लेखनी चलायी। उन्होंने जीवन मूल्यों व आदर्शों के साथ कभी समझौता नहीं किया। वे स्वाभिमानी प्रवृत्ति के लेखक थे। शुक्ल जी की रचना बिन्दु में गाँव की प्राथमिकता रही है। वे गाँव व किसानों के पक्षधर थे। वे समाज में फैली दहेज प्रथा के घोर विरोधी थे। उनके काव्य में गाँव व किसानों की समस्याओं का व्यापक वर्णन मिलता है। उनकी रचनाओं में किसानों की दृर्दशा परिलक्षित होती है। उन्होंने कल्पनावाद के कवियों की घोर निन्दा की है।
पद्मकान्त शर्मा प्रभात ने कहा गया प्रसाद शुक्ल सनेही जी की रचनाएं राष्ट्रपे्रम से ओतप्रोत हैं। उनकी मान्यता थी कि जिसके हृदय में स्वदेश का प्यार नहीं वह हृदय नहीं वह पत्थर के समान हैं। गया प्रसाद शुक्ल सनेही एक कवि निमार्ता के रूप में साहित्य जगत में प्रसिद्ध हैं। सनेही जी ने राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत कविताएं लिखीं। वे छन्दबद्ध ओजस्वी कविताएं लिखते थे। सनेही जी एक युग दृष्टा कवि के रूप में साहित्य जगत में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में स्वतंत्रता, राष्ट्रीयता, मातृभूमि को केन्द्र बिन्दु के रूप में रखा। डॉ. सत्यवान ने कहा साहित्य में आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी ने आलोचना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आलोचना के क्षेत्र में नन्द दुलारे वाजपेयी स्वतंत्र विचारों के पक्षधर थे। नन्द दुलारे वाजपेयी मौलिक रचनाकारों की श्रेणी में आते हैं। उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई है। उनकी रचनाएँ सारगर्भित हैं। उनकी सम्पादकीय टिप्पणियाँ भी विभिन्न क्षेत्रों में प्रखर आलोचना से परिपूर्ण हैं। उनकी मान्यता थी कि साहित्य ही समाज का सही मार्गदर्शन कर सकता है। इस अवसर पर रतन माला भारती द्वारा नन्द दुलारे वाजपेयी के निबन्ध गीतिका, गया प्रसाद शुक्ल सनेही की कविता, परिचय एवं पावस गीत का वाचन किया गया। वहीं राधिका रावत द्वारा नन्द दुलारे वाजपेयी के निबन्ध श्री रामचन्द शुक्ल तथा वंशीधर शुक्ल की कविता उठ जाग मुसाफिर भोर भई एवं संसार किसी के साथ नही चलता है का वाचन भी हुआ। डॉ. अमिता दुबे, प्रधान सम्पादक, उप्र हिन्दी संस्थान द्वारा कार्यक्रम का संचालन एवं संगोष्ठी में उपस्थित समस्त साहित्यकारों, विद्वत्तजनों एवं मीडिया कर्मियों का आभार व्यक्त किया गया।




