लखनऊ। ठाकुरगंज स्थित श्वेतांबर जैन दादाबाड़ी में चल रहे पर्युषण पर्व के तीसरे दिन सभी धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम संपन्न हुए। नित्य प्रतिक्रमण एवं मंदिर में तीर्थंकर प्रभु की अंग, अग्र एवं भाव पूजा के बाद आयोजित प्रवचन में साध्वी अर्चना जी एवं यशोगुणा जी महाराज साहब ने भगवान महावीर के शासन में दीक्षा लेने वाले वितभय पत्तन के अंतिम राजा उदयन का जीवन चरित्र तथा सेठ सुदर्शन के जीवन प्रसंग के बारे में विस्तार से बताया। साध्वी ने कहा कि पर्युषण पर्व आत्मशुद्धि, संयम और तपस्या का पर्व है। संयम धर्म हमें अपनी इंद्रियों और मन पर नियंत्रण रखना सिखाता है। क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों पर विजय प्राप्त कर क्षमा, विनय, सरलता और संतोष को जीवन में अपनाना ही सच्चे अर्थों में संयम धर्म की साधना है। उन्होंने कहा कि पर्युषण के इन पावन दिनों में प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर झांककर आत्मावलोकन करना चाहिए और जीवन में व्याप्त बुराइयों एवं विकारों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। संयम के माध्यम से ही मनुष्य अपने जीवन को धर्ममय बनाकर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसी क्रम में अंतिम श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी द्वारा लगभग 375 ईसा पूर्व में रचित जैन ग्रंथ कल्पसूत्र का संघ में प्रवेश एवं अष्टप्रकारी पूजा का आयोजन किया गया। इसका लाभ पद्म चंद जैन एवं संदीप जैन परिवार को प्राप्त हुआ। रात्रि जागरण के अवसर पर सीमंधर स्वामी के मंदिर को घी के दीपकों से भव्य रूप से सजाया गया। उज्जैन से आए चिराग जी कोठारी ने वाद्य यंत्रों के साथ भक्ति गीत प्रस्तुत किए। भक्ति एवं आध्यात्मिक वातावरण में विलियम, सोनू, योगेंद्र, संजीव, मधुर, नरेश, शरद, राजू, रोशन सहित बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु सम्मिलित रहे। पर्युषण पर्व के दौरान श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक स्वाध्याय, सामायिक, प्रतिक्रमण, तप, त्याग और संयम अपनाने का आह्वान किया गया। साथ ही सभी को आत्मावलोकन करते हुए क्षमा, करुणा और अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी गई।





