इस माह के शुरू में मध्य प्रदेश सरकार के आनंद विभाग ने, जोकि देश में अपने किस्म का पहला विभाग है, ने जिलाधिकारियों को लिखा कि वह उनके ‘हर घर दिवाली प्रयास का समर्थन करें ताकि उन लोगों के चेहरों पर भी मुस्कान लायी जा सके जो दुर्भाग्य से त्यौहार मनाने की स्थिति में नहीं हैं। इस कोशिश के तहत विभाग में पंजीकृत आनंद क्लबों ने हर जिले के स्लम क्षेत्रों में मिठाई, पटाखों, मिट्टी के दीयों व कपड़ों का वितरण किया ताकि गरीब लोग भी दिवाली मना सकें।
कोरोना संकटकाल के दौरान लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाने के लिए आनंद विभाग का ‘हर घर दिवाली तीसरा प्रयास था। इससे पहले सितंबर में इस विभाग ने अपने वालंटियर्स को ट्रेनिंग दी कि वह महामारी में लोगों के पास जायें और उन्हें प्रेरक कथाएं सुनाएं ताकि वह सीमित संसाधनों में भी प्रसन्न रह सकें।
अप्रैल में आनंद विभाग ने राज्य के लोगों के लिए हिंदी में अलोहा पाठ्यक्रम शुरू किया था। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 2016 में अपने पिछले कार्यकाल के दौरान आनंद विभाग स्थापित किया था, लेकिन 2018 में कमलनाथ सरकार ने इस विभाग को आध्यात्मिक विभाग में मिला दिया था। अब यह विभाग फिर से स्वतंत्र विभाग के रूप में कार्य कर रहा है और जिला स्तर पर इसमें लगभग 53,000 वालंटियर्स हैं, जिन्हें ‘आनंदका कहा जाता है, जिन्हें ट्रेनिंग तो दी जाती है, लेकिन राज्य सरकार पैसा नहीं देती है।
गौरतलब है कि अलोहा इंडिया, जोकि अलोहा इंटरनेशनल (मलेशिया) की शाखा है, की स्थापना चेन्नै में 2002 में हुई थी। यह संस्था 4 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए विशेष रूप से डिजाइन किये गये एडवांस्ड अबेकस व मानसिक गणित में ग्लोबल लीडर है। मध्य प्रदेश में अलोहा पाठ्यक्रम को हिंदी में अनूदित करके शुरू किया गया है और इसमें गुजरात की तरह वैदिक गणित व स्पीड गणित को भी शामिल किया गया है ताकि बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लायी जा सके।
बहरहाल, सवाल यह है कि क्या साल में एक दिन (वह भी सिर्फ दिवाली के अवसर पर) स्लम क्षेत्रों में मिठाई, पटाखे, दीये व कपड़े वितरित करके, प्रेरक कथाएं सुनाकर व अलोहा पाठ्यक्रम शुरू करके लोगों के जीवन में खुशी लायी जा सकती है? यह प्रयास सराहनीय अवश्य है लेकिन जिंदगी में प्रसन्नता लाने के लिए पर्याप्त नहीं। अगर लोग जीवन की बुनियादी जरूरतों (शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, बिजली, पानी, सुरक्षा आदि) के अभाव को दिन-रात महसूस करते हुए स्लम में रहेंगे तो आप उन्हें कितनी ही प्रेरक कथाएं सुना दीजिये उनके होंठो पर मुस्कान नहीं आने की।
सरकारों का काम गुड़ (पढ़ें बुनियादी आवश्यकताओं) उपलब्ध कराने का होना चाहिए न कि गुड़ जैसी बातें करने का। जिस तरह शतुरमुर्ग के बालू में सिर देने से तूफान नहीं टलता या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कंगना पर फोकस करने से कोविड व किसान समस्याओं पर पर्दा नहीं पड़ता, ठीक उसी तरह से साल में एक दिन मिठाई बंटवाकर लोगों के जीवन में न खुशी आती है और न खुशहाली।
संभवत: सरकारों द्वारा प्राथमिकताएं बदलने के कारण ही खुशी सूचकांक में भारत का स्थान 144वां है, जबकि फिनलैंड लगातार तीसरे साल भी प्रथम स्थान पर है। इस साल मार्च में संयुक्त राष्ट्र ने वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट-2020 जारी की जिसमें 14 पैमानों पर कुल 156 देशों का सर्वे किया गया था। 3.573 अंकों के साथ भारत लेसोथो और मलावी देशों के बीच 144वें स्थान पर है।





