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पारस अंतरराष्ट्रीय दृश्यकला प्रदर्शनी का भव्य शुभारंभ

लखनऊ। शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य में कला दीर्घा, अंतरराष्ट्रीय दृश्य कला पत्रिका एवं कला स्रोत कलावीथिका के संयुक्त तत्वावधान में पारस अंतरराष्ट्रीय दृश्यकला प्रदर्शनी का आयोजन कला स्रोत कला वीथिका, अलीगंज, लखनऊ में किया गया। प्रदर्शनी का उद्घाटन साहित्य जगत में सूर्य के रूप में प्रतिष्ठित प्रख्यात साहित्यकार, चिंतक एवं सौंदर्यशास्त्री आचार्य सूर्य प्रसाद दीक्षित ने किया। दीप प्रज्ज्वलित कर उद्घाटन अवसर पर आचार्य सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहा कि जहाँ शब्दों की सीमाएँ आरंभ होती हैं, वहीं तूलिका, रंग, रेखा और रूप अपनी अभिव्यक्ति की भूमिका ग्रहण करते हैं। सभी कलाएँ अंतर्गुम्फित हैं और एक-दूसरे से संवाद करती हुई मनुष्य की संवेदना को व्यापक बनाती हैं। उन्होंने कहा कि कला दीर्घा की प्रकाशक डॉ. लीना मिश्र एवं संपादक डॉ. अवधेश मिश्र द्वारा निरंतर किए जा रहे कला-दस्तावेजीकरण तथा विविध कला-गतिविधियों के माध्यम से कलाकारों और कलारूपों को व्यापक कला-जगत के समक्ष प्रतिष्ठित करने का कार्य अत्यंत सराहनीय है। इस रचनात्मक यात्रा में कला स्रोत कलावीथिका की सहभागिता इसके निदेशकद्वय अनुराग डिडवानिया एवं मानसी डिडवानिया की कला के प्रति प्रतिबद्धता और सक्रिय संवेदनशीलता को रेखांकित करती है। शिक्षक दिवस के अवसर पर आयोजित पारस प्रदर्शनी का मूल भाव गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सृजनात्मक समर्पण है। उद्घाटन अवसर पर आचार्य राजेंद्र प्रसाद, आचार्य आलोक कुमार, आचार्य रविकांत पांडेय तथा कला दीर्घा के संपादक डॉ. अवधेश मिश्र एवं प्रदर्शनी के समन्वयक डॉ. अनीता वर्मा और सुमित कुमार का सम्मान मुख्य अतिथि आचार्य सूर्य प्रसाद दीक्षित, कला स्रोत कला वीथिका की निदेशक मानसी डिडवानिया तथा कला दीर्घा की प्रकाशक डॉ. लीना मिश्र द्वारा किया गया। इस अवसर पर डॉ. लीना मिश्र ने श्रीमती मानसी डिडवानिया को पुष्प-पात्र भेंट कर सम्मानित किया। पारस की संकल्पना भारतीय सांस्कृतिक चेतना में निहित उस रूपांतरणकारी प्रतीक से प्रेरित है, जिसके स्पर्श से साधारण असाधारण और लौह स्वर्ण में परिवर्तित हो जाता है। इसी भाव को गुरु के संदर्भ में देखा जाए तो गुरु वह पारस है, जो अपने ज्ञान, अनुभव, स्नेह, अनुशासन और संस्कार के स्पर्श से शिष्य के भीतर छिपी प्रतिभा और संभावनाओं को पहचानकर उन्हें विकसित होने की दिशा देता है। प्रदर्शनी में सम्मिलित कलाकारों ने अपने-अपने कलाकर्म के माध्यम से इसी गुरु-ऋण, स्मृति और कृतज्ञता को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है। प्रदर्शनी के समन्वयक डॉ. अनीता वर्मा एवं सुमित कुमार के संयोजन में आयोजित इस कला आयोजन में 48 कलाकारों की कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं। इनमें समकालीन कला की नवीनतम प्रवृत्तियों से संबद्ध विविध प्रयोगों को देखा जा सकता है। चित्रकला और छापाचित्र से लेकर सिरामिक, टेक्सटाइल कोलाज, छायाचित्र तथा बुनाई जैसे विभिन्न माध्यमों में सृजित कलाकृतियाँ कला स्रोत कला वीथिका के परिसर में एक बहुवर्णी और बहुआयामी दृश्य-संसार का निर्माण कर रही हैं। विभिन्न माध्यमों और कलाभाषाओं में व्यक्त ये कृतियाँ एक-दूसरे से संवाद करती हुई भारतीय समकालीन कला की विविधता और प्रयोगशीलता को रेखांकित करती हैं। पारस की एक विशिष्ट विशेषता इसकी अंतरराष्ट्रीय सहभागिता है। भारत के साथ बांग्लादेश और श्रीलंका के कलाकार भी इस प्रदर्शनी में सहभागी हैं। तीन देशों के कलाकारों की रचनात्मक उपस्थिति ने इसे व्यापक दक्षिण एशियाई सांस्कृतिक संदर्भ प्रदान किया है। भौगोलिक सीमाओं, भाषायी विविधताओं और अलग-अलग सांस्कृतिक अनुभवों के बावजूद गुरु के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की संवेदना सभी कलाकारों को एक साझा भावभूमि पर ले आती है। इस दृष्टि से पारस केवल कलाकृतियों का प्रदर्शन नहीं, विभिन्न संस्कृतियों और कलाभाषाओं के मध्य एक जीवंत रचनात्मक संवाद भी है। प्रदर्शनी में उपस्थित कलाकृतियों में विभिन्न कला-गुरुओं की परंपराओं, उनके संस्कारों, सौंदर्यबोध और कलाकारों की व्यक्तिगत एवं स्थानीय संवेदनाओं के विविध रूप देखने को मिलते हैं। कहीं परंपरा आधुनिक संवेदना से संवाद करती दिखाई देती है, कहीं लोक-स्मृति समकालीन दृश्यभाषा में रूपांतरित होती है और कहीं रंग, रेखा, रूप तथा माध्यम के अभिनव प्रयोग गुरु-शिष्य संबंध की आत्मीयता को मूर्त रूप प्रदान करते हैं।

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