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ध्रुपद की पारम्परिक शैली, ताल-व्यवस्था तथा अभ्यास पद्धति को समझा

ध्रुपद कार्यशाला का द्वितीय दिवस प्रेरणादायक वातावरण में सम्पन्न
लखनऊ। भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय, लखनऊ में आयोजित ध्रुपद कार्यशाला का द्वितीय दिवस अत्यंत प्रेरणादायक एवं शिक्षाप्रद वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यशाला के द्वितीय दिवस के प्रारम्भ के अवसर पर विश्वविद्यालय की गायन विभागाध्यक्ष प्रो. सृष्टि माथुर एवं तालवाद्य विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज कुमार मिश्रा के साथ विश्ववद्यालय के गायन विभाग के शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे । प्रथम सत्र में ॐकार साधना के साथ कार्यशाला का शुभारम्भ किया गया, जिसके पश्चात गणेश वंदना के रूप में गणेश ध्यान मंत्र (वक्रतुंड महाकायङ्घ स्वयं गजाननंङ्घ) का सामूहिक गायन प्रो० मधु भट्ट तैलंग जी द्वारा विद्यार्थियों से कराया गया। इस आध्यात्मिक एवं पारम्परिक आरम्भ ने कार्यशाला के वातावरण को अत्यंत साधनामय बना दिया। इसके उपरांत प्रो. मधु भट्ट तैलंग जी ने विद्यार्थियों को ध्रुपद परम्परा के अंतर्गत गणेश परन, विभिन्न प्रकारों में तालबद्ध सरगम अभ्यास तथा आदि, चौताल एवं गणसम्पदा जैसी पखावज तालों का विस्तृत परिचय कराया। उन्होंने इन तालों के ठेकों की संरचना को समझाते हुए विद्यार्थियों से उनका विधिवत अभ्यास भी कराया।
द्वितीय दिवस के सत्र में विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लेते हुए ध्रुपद की पारम्परिक शैली, ताल-व्यवस्था तथा अभ्यास पद्धति के सूक्ष्म पहलुओं को समझा। इस प्रकार कार्यशाला का द्वितीय दिवस ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक वातावरण में सम्पन्न हुआ।
विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो० मांडवी सिंह ने बताया कि ध्रुपद भारतीय शास्त्रीय संगीत की अत्यंत प्राचीन एवं गरिमामयी परम्परा है, जिसके संरक्षण और संवर्धन के लिए इस प्रकार की कार्यशालाएँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजनों के माध्यम से विद्यार्थियों को न केवल संगीत की परम्परागत साधना से जुड़ने का अवसर मिलता है, बल्कि वे उसके गूढ़ एवं व्यावहारिक पक्षों को भी गहराई से समझ पाते हैं।
विश्वविद्यालय की कुलसचिव डॉ० सृष्टि धवन ने बताया कि इस प्रकार की शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियाँ विद्यार्थियों के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने कहा कि ध्रुपद जैसी प्राचीन गायन परम्परा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने और उसके प्रति रुचि जागृत करने के लिए विश्वविद्यालय निरंतर ऐसे आयोजनों को प्रोत्साहित करता रहेगा।

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