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फिर आई याद कबीर की सहित तीन पुस्तकों का विमोचन

डॉ. शम्भुनाथ की प्रथम पुण्यतिथि पर स्मृति समारोह आयोजित
लखनऊ। स्मृतिशेष डॉ. शम्भुनाथ की प्रथम पुण्यतिथि पर पारस बेला न्यास, कबीर शांति मिशन तथा डॉ. शम्भुनाथ के परिवार के संयुक्त तत्वावधान में कबीर शांति मिशन, गोमती नगर में एक स्मृति समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम में तीन पुस्तकों का विमोचन किया गया—डॉ. शम्भुनाथ की कृति फिर आई याद कबीर की, मम त्रैलोक्य तथा शम्भु सुरभि। मम त्रैलोक्य डॉ. अनिल कुमार पाठक की कृति है, जबकि शम्भु सुरभि डॉ. शम्भुनाथ पर केंद्रित स्मृति-ग्रंथ है। मम त्रैलोक्य में डॉ. अनिल कुमार पाठक ने माता-पिता और गुरु की त्रिमूर्ति को उच्च उद्गारों के साथ उद्धृत किया है। शम्भु सुरभि ग्रंथ में डॉ. शम्भुनाथ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के विभिन्न पक्षों का वर्णन है, जिसका सम्पादन डॉ. अनिल कुमार पाठक ने किया है। डॉ. शम्भुनाथ जी के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए मुख्य अतिथि प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहा कि शम्भुनाथ जी का समग्र व्यक्तित्व एक कुशल प्रशासक का था। उन्होंने प्रदेश के उच्चतम प्रशासनिक पद, मुख्य सचिव, का कुशलतापूर्वक निर्वहन किया। इसके पूर्व वे विभिन्न विभागों में सचिव तथा कई जनपदों में जिलाधिकारी रहे। अपनी प्रशासनिक क्षमता, पारदर्शिता और शुचिता के चलते निरन्तर उनकी चर्चा होती रही। उनके व्यक्तित्व का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष साहित्यकार का था। उन्होंने संवेदना के धरातल पर उतरकर अनेक काव्य-कृतियाँ रचीं। उनकी हिन्दी कविताएँ भी उल्लेखनीय हैं, जिनका प्रकाशन अतीत के गर्भ में हुआ है। कवि होने के साथ-साथ उनका समीक्षक रूप भी बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने दिनकर, बच्चन, कबीर और रामकथा जैसे विषयों पर मौलिक और उपयोगी ग्रंथ प्रकाशित किए। वे एक कुशल वक्ता थे। इसका एक कारण यह भी था कि मूलत: वे शिक्षक रहे थे। हिन्दी संस्थान के अध्यक्ष के रूप में उनकी सेवाएँ चिरस्मरणीय रहेंगी। इस अवसर पर प्रस्तुत अभिनन्दन ग्रंथ उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व के अनेक पक्षों को उद्घाटित करता है। फिर आई याद कबीर की में उन्होंने बड़े खुले मन से अपने विचार व्यक्त किए हैं। डॉ. अनिल कुमार पाठक की पुस्तक मम त्रैलोक्य में माता-पिता तथा गुरु के महत्व को प्रतिपादित किया गया है। ये तीनों पूज्य, वन्दनीय और स्मरणीय हैं। सेवानिवृत्त आई.ए.एस. डॉ. डी. एन. लाल ने डॉ. शम्भुनाथ से जुड़ी स्मृतियाँ साझा कीं। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अपने गुरु से मिलता है, तो उसे यह आभास नहीं हो पाता कि वह ईश्वर-तुल्य व्यक्तित्व के सान्निध्य में है। डॉ. शम्भुनाथ जी के व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हुए वे भावविभोर हो गए। उन्होंने कहा कि सेवाकाल में डॉ. शम्भुनाथ जी ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका समीक्षक रूप भी विशेष उल्लेखनीय है। कार्यक्रम में डॉ. शम्भुनाथ जी की धर्मपत्नी चन्दा नाथ ने बताया, कबीर पर पुन: कुछ लिखने का मेरा आग्रह था, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। फिर आई याद कबीर की कृति आज आप लोगों के सामने है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए हिन्दी संस्थान के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि डॉ. शम्भुनाथ जी बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी होने के बावजूद अत्यन्त निरभिमानी थे। जो भी व्यक्ति उनके साथ रहा होगा, उसने उनसे कुछ न कुछ अवश्य सीखा होगा। उन्होंने डॉ. शम्भुनाथ जी के दिनकर-साहित्य में योगदान का उल्लेख करते हुए बताया कि जब भी उनसे बात होती थी, तो लम्बे समय तक साहित्यिक चर्चा चलती थी। उन्होंने अपनी काव्य-पंक्तियों के माध्यम से डॉ. शम्भुनाथ जी को श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम में अनेक साहित्यकार तथा डॉ. शम्भुनाथ से जुड़े गणमान्य लोग उपस्थित थे।कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. अनिल कुमार पाठक ने किया।

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