आध्यात्म साधन, मानव जीवन का परम लक्ष्य अपने दृष्टिकोण खण्ड खण्डता, विभिन्नता, संकीर्णता से हटाकर सर्वत्र उस विश्वात्मा, परमात्मा की विराट सत्ता का दर्शन और उसकी अनुभूति प्राप्त करना मनुष्य के लिए यही सत्य और सनातन राजमार्ग है। अब जाति, गुण, कर्म, स्वभाव संस्कार आदि समाप्त हो जाते हैं। मानव मात्र में आत्मदृष्टि से देखने पर सर्वत्र उस विश्वात्मा की प्रतिष्ठापना के दर्शन होते हैं।
इतना ही नहीं प्राणी मात्र वृक्ष, वनस्पतियां, जड़, चैतन्य में उसी परम शक्ति का क्रिया कलाप दिखाई देता है और तभी निर्वाचनीय आनन्द की प्राप्ति होती है। जिस क्षण उस विश्वात्मा की अनुभूति प्राप्त होगी उसी क्षण समस्त पाप, ताप, अभ्यास जनित संस्कार आचरणों का अंत हो जायेगा और अमृत यद्धिभाति अमृत रूप में जो सब में प्रकाशित है उसी अमृत में आत्मा का प्रवेश होगा। फिर सर्वत्र अनन्त आनन्द रूपी अमृत के ही दर्शन होंगे।
हमारी आत्मा में भूमा स्थिति दिव्य प्रकाश मुखिरत हो उठेगा। साधना का तात्पर्य ही है साथ लेना, सधा लेना, पशु प्रशिक्षक यही करते रहते हैं। अनगढ़ और उच्छृंखल प्राणी को उपयोगी समझा जा सके। उसके बढ़े हुए स्तर का मूल्यांकन हो सके। पालने वाला अपने को लाभान्वित हुआ देख सके। सिखाने वाला भी अपने प्रयास की सार्थकता देखते हुए प्रसन्न हो सके। समझा यह जाता है कि भक्त भगवान को साधता है। उसको मूर्ख समझते हुए उसकी गलतियां निकालता रहता है। तरह-तरह के उलाहने देता है।
साथ ही गिड़गिड़ाकर नाक रगड़कर, खींसे निपोर कर अपना उचित अनुचित उल्लू सीधा करने के लिए जाल जंजाल बुनता है। प्रशंसा के पुल बांधता है। छिटपुट भेंट चढ़ाकर उसे फुसलाने का प्रयत्न करता है। समझा जाता है कि सामान्य लोगों से व्यवहारिक जगत में अदान-प्रदान के आधार पर ही लेन-देन चलता है पर ईश्वर या देवता ऐसे है जिन्हें वाणी की वाचालता तथा शारीरिक मानसिक उचक-मचक करने भर से वशवर्ती किया जा सकता है।
यह दार्शनिक भूल मनुष्य को प्रकारान्तर से प्रच्छन्न नास्तिक बना देती है। एक नास्तिक वह है जो प्रत्यक्षवाद के आधार पर ईश्वर की सत्ता स्पष्ट दृष्टिगोचर न होने से उसकी सत्ता से इनकार करते हैं। दूसरे प्रच्छन्न नास्तिक वे हैं जो उससे पक्षपात की, मुफ्त में लंबी चौड़ी मनोकामनाओं की पूर्ति चाहते रहते हैं।
मनुष्य विधि व्यवस्थाओं को तोड़ता छोड़ता रहता है। पर ईश्वर के लिए यह संभव नहीं है कि अपनी बनाई कर्म फल व्यवस्था का स्वयं उल्लंघन करे या दूसरों को ऐसा करने के लिए उत्साहित करे तथाकथित भक्त लोग ऐसी ही आशाएं किया करते हैं। अंतत: उन्हें निराश होना पड़ता है।





