इतिहास साक्षी है कि गलत प्रवृत्तियों या शक्तियों को खत्म करने के लिए गलत विचारों का सहारा लिया जाता रहा है। कई बार बुराइयां इतनी प्रबल हो जाती है कि उनको समाप्त करने के लिए किसी दूसरी बुराई को अपनाना पड़ता है। ऐसी बुराइयां जिनके खत्म होने पर मानवता का हित हो उनके खत्मे के लिए छोटी-छोटी बुराइयों का सहारा लेने को विद्वान नीति सम्मत मानते हैं।
आसुरी शक्तियां जब अत्यधिक प्रबल हो जाती हैं और उनको वश में करने के लिए सीधे-सीधे तरीके असफल होने लगते हैं तो कांटे से कांटा निकालने की, ‘शठे शठ्यं समाचरेत्’ की नीति अपनानी पड़ती है। सिंह, व्याघ्र आदि को पकड़ना या मरना सीधे साधे तरीके से नहीं हो सकता। उनके सामने जाकर कुश्ती लड़ना या पकड़ लाना आदमी की शक्ति से बाहर है। जल में फंसाकर, छिपकर, बंदूक आदि हथियार से आश्रय लेकर ही उन्हें पकड़ा या मारा जा सकता है।
मोटी दृष्टि से देखने पर यह क्रियाएं छल, धोखेबाजी, कायरतापूर्ण आक्रमण कही जा सकती हैं, पर विवेकवान पुरुष जानते हैं कि इसमें कुछ भी अनीति नहीं है। हिंसक जन्तुओं की भयंकर करतूतें, उनको रोकने की अनिवार्य आवश्यकता एवं मनुष्य की अल्प शक्ति पर विचार करते हुए यह उचित प्रतीत होता है कि इन हिंसक जन्तुओं को जिस प्रकार से भी छल, बल से परस्त किया जा सकता हो तो वैसा निस्संकोच करना चाहिए।
प्राचीन इतिहास पर जब हम दृष्टिपात करते हैं तो प्रतीत होता है कि इस नीति का अवलम्बन अनेक महापुरुषों को करना पड़ा है। धर्म की स्थूल मर्यादाओं का उल्लंघन करना पड़ा है। इस उल्लंघन में उन्होंने लोकहित का, धर्मवृद्धि का, अधर्म विनाश का ध्यान अपनी पूर्ण सद्भावना के साथ रखा था इसलिए उनको उस पाप का भागी नहीं बनना पड़ा जो साधारणतया धर्म मर्यादाओं के उल्लंघन करने पर होता है।
भस्मासुर ने जब यह वरदान प्राप्त कर लिया कि मैं जिस किसी के सिर पर हाथ रख दूं वही भस्म हो जायेगा तो उसने महादेव जी को ही भस्म करने की ठानी ताकि सुन्दरी पार्वती को वह प्राप्त कर ले। महादेव प्राण बचाकर भागे। विष्णु भागवान ने देखा कि यह तो बहुत बड़ा संकट बन गया है।
इसे परास्त करने के लिए छल का प्रयोग करना चाहिए। वे पार्वती का रूप बनाकर पहुंचे और कहा-असुरराज। मैं आपको बड़ा प्रेम करती हूं। पर एक बात मुझे शंकरजी की बहुत पसंद है और वह है उनका नृत्य। आप भी वैसा नृत्य कर सकें तो मैं इसी क्षण आपके साथ चलने को तैयार हूं। भस्मासुर बड़ा प्रसन्न हुआ। वह पार्वती के साथ नृत्य करने लगा। नृत्य मदमस्त होकर उसने अपना हाथ अपने ही सिर पर रख लिया रखा और स्वयं जलकर भस्म हो गया।





