मनुष्य की सबसे मूल्यवान और कभी न खत्म होने वाली संपदा क्या है? निश्चित रूप से सद्गुण। जी, हां! किसी एक मनुष्य की नहीं यह समूची मानवता की अक्षय पूंजी है। एक संवेदनशील मनुष्य हमेशा अच्छा और सकारात्मक ही सोचता है। सभी महान इंसान अनेक सद्गुणों से युक्त होते हैं। अपने सद्गुणों के कारण ही वे महान होते हैं। जो इंसान जीवन की कठिन परिस्थितियों में मानवीय सद्गुणों से भरपूर होते हैं, दुनिया में दूसरों के लिए वही प्रेरणा स्रोत बनते हैं।
यदि कोई इंसान अपनी परेशानियों में भी दूसरों के प्रति विनम्र और संवेदनशील बना रहता है, तो फिर दुनिया में कोई भी कष्ट उसे कष्ट प्रतीत नहीं होगा। क्योंकि वास्तव में इनके विराट व्यक्तित्व के सामने कोई भी परेशानी बौनी साबित होती है। दूसरों के प्रति स्वाभाविक विनम्रता मानव जीवन का सबसे महान गुण है। हालांकि कुदरत सबको जन्म के समय यह गुण देती है, लेकिन इसे विकसित किसी की परवरिश ही करती है। धरती में जन्म लेने वाले हर इंसान में जीने की एक आत्म-व्यवस्था होती है। परंतु अपनी स्वार्थपूर्ण परवरिश के चलते ज्यादातर लोग इस तरह के गुणों को व्यवहारिक नहीं बना पाते।
नतीजतन वे जरा सी कठिनाई के समय अपने व्यक्तित्व के सद्गुणों को भूलकर दुर्व्यवहार करने लगते हैं। जबकि सच्चाई यही है कि व्यक्तित्व सकारात्मक गुण सभी मनुष्यों में जन्मजात होते हैं। कोई भी किसी भौतिक अभाव के कारण यह नहीं कह सकता कि उसके पास इन सद्गुणों का अभाव तार्किक है। अमीर हो या गरीब सभी के पास व्यक्तित्व के गुणों की यह प्राकृतिक संपदा होती है। बस आवश्यकता मात्र इतनी ही होती है कि जीवन के दुखपूर्ण और कष्ट साध्य समय में ऐसे गुणों का निरु पण व्यक्ति स्वयं में किस दक्षता के साथ कर सकता है। जिसकी सीख हमें हमारे मां-बाप से यानी हमारी परवरिश से मिलती है।
ईश्वर ने मनुष्य को विशेष बुद्घि प्रदान की है ताकि वह सांसारिक समस्याओं के मध्य कुंठित, भ्रमित और विचलित न होकर अपने गुणों की सहायता से सदैव स्थिर और सक्रिय रहे। यह वास्तव में संवेदनशील परवरिश से आती है। एक बार हमें यह परवरिश मिल जाए तो स्वाभाविक रूप से सद्गुणों का विकास हो जाता है। एक बार हममें सद्गुणों की यह पूंजी विकसित हो जाए तो इसका कभी क्षय नहीं होता।
याद रखें, विपत्ति में सद्गुण ही काम आते हैं। ऋग्वेद में कहा गया है- कृण्वंतो विश्वमार्यम् यानी दुनिया को बेहतर बनाने के लिए निरंतर कोशिश करते रहो। यह कहने की जरूरत नहीं है कि हम दुनिया को बेहतर तभी बना सकते हैं,जब खुद को एक बेहतर और सकारात्मक इंसान बनाएं। एक बेहतर इंसान वही है, जिसमें दया, करुणा, प्रेम, अहिंसा, न्याय, सदाशयता, भाईचारा, सत्य, शुभ, परोपकार एवं संयम जैसे गुण हों।





