सवा सेर गेंहूं, शतरंज के खिलाड़ी जैसी कहानियां लखनऊ में लिखी
लखनऊ। सर्वश्रेष्ठ लेखकों की बात होती है तो मुंशी प्रेमचन्द का नाम पहली फेहरिस्त में रहता है। प्रेमचन्द को किसी मुल्क या शहर की सरहद तक तक नहीं बांधा जा सकता है। प्रेमचन्द को पूरी दुनिया में सम्मान मिला। लखनऊ की जमीन ही वो जमीन बनी जहां प्रेमचन्द ने सवा सेर गेंहू और शतरंज के खिलाड़ी जैसी नायाब कहानी लिखी। सवा सेर गेंहू कहानी पर आधारित नाट्य मंचन आज भी हो रहा है और शतरंज के खिलाड़ी पर फिल्म तक बनी। इसके साथ ही कई नाटक और रचनाएं लखनऊ में लिखीं। प्रेमचन्द वर्ष 2024 से 1932 तक लखनऊ में रहे।
साहित्यकार डा. नलिन रंजन सिंह ने कहा कि ये खुशकिस्मती है कि कालजयी रचनाकार मुंशी प्रेमचन्द लखनऊ में रहे। अपनी साहित्य साधना के साथ ही नौकरी भी की। श्री रंजन ने बताया कि अगस्त 1924 में वह गंगा पुस्तकमाला के साहित्यिक सलाहकार की हैसियत से लखनऊ पहुंचे। इस अवधि में वह ‘चौगाने हस्ती’ की रचना में लगे रहे, जो 1925 में गंगा पुस्तकमाला, लखनऊ से प्रकाशित हुई । 29 अगस्त, 1925 को उन्होंने गंगा पुस्तकमाला की नौकरी छोड़ दी और बनारस वापस आ गये। लगभग दो वर्ष बनारस रहने के बाद 15 फरवरी, 1927 को वे ‘माधुरी’ के सहकारी सम्पादक के रूप में पुन: लखनऊ पहुंचे। 15 मई को बनारस से पत्नी और बच्चे भी लखनऊ आ गये। 10 जनवरी, 1931 को नवलकिशोर प्रेस के मालिक विष्णुनारायण भार्गव का स्वर्गवास हो गया और प्रेमचन्द का तबादला सम्पादक पद से प्रेस के बुकडिपो में कर दिया गया। अक्टूबर, 1931 में वे नवलकिशोर प्रेस की नौकरी से अलग हो गये। नलिन रंजन सिंह ने बताया कि अक्तूबर 1931 में नवल किशोर प्रेस की नौकरी से अलग होने के बाद प्रेमचन्द नवम्बर के आरम्भ में पहली बार दिल्ली घूमने गये। फरवरी, 1932 में वे लखनऊ से बनारस लौट आये। लगभग डेढ़ वर्ष तक वे बनारस में ही रह कर हंस, जागरण और सरस्वती प्रेस की व्यवस्था में लगे रहे और साथ ही साहित्य साधना भी करते रहे । 1 जून, 1934 को वे अजन्ता सिनेटोन कम्पनी के प्रोप्राइटर एम. भवनानी के निमन्त्रण पर बम्बई पहुंचे और 3 अप्रैल, 1935 तक वहां उनकी कम्पनी में रहे। इस अवधि में उन्होंने मद्रास, मैसूर, बंगलोर, पूना आदि की यात्रा की । सिनेटोन कम्पनी के बन्द हो जाने के कारण वे बम्बई से खंडवा, सागर, इलाहाबाद होते हुए बनारस लौटे । बम्बई में ही उन्होंने गोदान लिखना शुरू कर दिया था जो बनारस आने पर पूरा हुआ। इस समय तक प्रेमचन्द हिन्दी साहित्य के शिखर व्यक्तित्वों में शामिल हो चुके थे। 9 और 10 अप्रैल 1936 को प्रगतिशील लेखक संघ का प्रथम अधिवेशन लखनऊ के रिफा-ए-आम क्लब में हुआ। 10 अप्रैल को अधिवेशन की अध्यक्षता प्रेमचन्द ने की ।





