आत्मशोधन एक प्रकिया है। ईश्वर की साधना दरअसल एक इंसान का पूर्ण परिष्कार कर देती है। व्यक्ति में अनेक सांसारिक इच्छाएं मौजूद होती हैं और मनुष्य होने के कारण यह स्वाभाविक भी है। लेकिन ईश्वर की साधना उसके गलत विचारों, गलत संस्कारों और ऐसी प्रवृत्तियों जिन्हें सामाजिक, धार्मिक संदर्भ में उचित नहीं कहा जा सकता है, को पूरी तरह से समाप्त कर उसको संस्कारी, अध्यात्मिक विचारों के प्रति समर्पित व्यक्ति बना देती हैं।
तमाम धार्मिक विधि-विधानों के द्वारा पूजा उपचारों के द्वारा मनन, चिंतन, स्वाध्याय, सत्संग जैसे विचार मंथनों द्वारा आत्मशोधन की जो प्रक्रिया चलती है, उसी को देखते हुए यह जाना जा सकता है कि साधना में कितनी प्रगति हुई। साधक को सिद्धि मिलती है, बिना आत्मशोधन का भजन निरर्थक जाता है। अपवाद रूप में किसी को कोई दैवी अनुग्रह मिल भी जाये तो उसका परिणाम अंतत: भस्मासुर, रावण कुंभकरण, मारीच, कंस, हिरण्यकश्यप आदि की तरह घोर विपत्ति के रूप में सामने आता है। फलित तो विभीषण, हनुमान जैसे सद्भाव, सम्पन्न लोगों की साधना ही होती है।
जीवन कल्पवृक्ष है, उसकी साधना यदि सही रीति से की जाती है तो वही अपने अमृत फलों से साधक को कल्प वृक्ष बना देता है। ईश्वर ने श्रम, समय, बुद्धि, प्रतिभा जैसी दिव्य सम्प्रदायें हर व्यक्ति को प्रचुर परिणाम में दी हैं। इनका सदुपयोग ही उस बुद्धिमत्ता का परिचायक है जिसे शास्त्रकारों ने ऋतम्भरा प्रज्ञा या ब्रह्मविद्या गायत्री कहा है। मानवी निर्माण की आवश्यकता नितान्त स्वल्प है। उपार्जन की क्षमता असीम है।
ऐसी दशा में किसी के अभाव ग्रस्त या पिछड़े रहने का कोई कारण नहीं। दरिद्रता और दुर्गति तो आंतरिक पिछड़ेपन की ही प्रतिक्रिया है। साधना द्वारा अपने दृष्टिकोण, स्वभाव और व्यवहार में सुधार किया जाता है। मन:स्थिति में परिवर्तन आते ही परिस्थिति बदलने लगती है। आंख की पुतली ही दृश्य जगत का परिचय कराती है। कान की झिल्ली में भरी सामर्थ्य से ही संसार में संव्याप्त शब्द सम्पदा से लाभान्वित होने का अवसर मिलता है।
अपना मस्तिष्क ही इस विश्व वसुधा में बिखरे हुए वैभव को पहचानने और चुनने का सौभाग्य प्रदान करता है। इन्द्रिय शक्ति की प्रखरता से ही अनेकानेक रसास्वादनों का सुख मिलता है। अपने आंख, कान, मस्तिष्क एवं इन्द्रिय तन्तु यदि विकृत हो जाये तो इस संसार में निराशा और निस्तब्धता के अतिरिक्त और कुछ भी शेष नहीं बचता है। आत्मसत्ता का स्तर ही संसार के पदार्थों का प्राणियों को उपयोगी अनुपयोगी बनाता रहता है।





