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भातखंडे के छात्रों को ध्रुपद के सांगीतिक महत्व को समझाया

प्रो. मधु भट्ट तैलंग के निर्देशन में ध्रुपद गायन की चार दिवसीय कार्यशाला का शुभारम्भ
लखनऊ। बुधवार को भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय, लखनऊ द्वारा पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे जी की पावन स्मृति में स्थापित पीठ के अंतर्गत ध्रुपद गायन पर चार दिवसीय कार्यशाला का शुभारम्भ विश्वविद्यालय के सुजान सभागार में अत्यंत गरिमामय एवं प्रेरणादायक वातावरण में सम्पन्न हुआ। यह कार्यशाला दिनांक 25 फरवरी से 28 फरवरी तक विश्वविद्यालय के गायन विभाग द्वारा आयोजित की जा रही है, जिसमें सुप्रसिद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की विदुषी प्रो. मधु भट्ट तैलंग विशेषज्ञ के रूप में विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को मार्गदर्शन प्रदान कर रही हैं।
कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य विशेषज्ञ प्रो. मधु भट्ट तैलंग तथा कार्यक्रम संयोजिका एवं गायन विभागाध्यक्ष प्रो. सृष्टि माथुर द्वारा माता सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर किया गया। तत्पश्चात प्रो. सृष्टि माथुर द्वारा प्रो. मधु भट्ट तैलंग को पुष्पगुच्छ भेंट कर उनका पारंपरिक विधि से स्वागत एवं अभिनन्दन किया गया। इस अवसर पर तालवाद्य विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज कुमार मिश्रा सहित विश्वविद्यालय के गायन विभाग के शिक्षकगण, संगतकर्ता, शोधार्थी तथा बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।
कार्यशाला के प्रथम दिवस पर प्रो. मधु भट्ट तैलंग ने ध्रुपद गायन का परिचय देते हुए उसकी प्राचीन एवं समृद्ध परम्परा पर आधारित सप्रयोग व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने इस अवसर पर भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय द्वारा भारतीय संगीत की इस प्राचीन परम्परा के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए विश्वविद्यालय के प्रति आभार व्यक्त किया। अपने व्याख्यान में उन्होंने ध्रुवपद शब्द की व्युत्पत्ति को स्पष्ट करते हुए ध्रुव और पद के संधि-विच्छेद के माध्यम से उसके विभिन्न अर्थों एवं सांगीतिक महत्व को समझाया। उन्होंने बताया कि ध्रुपद हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की अत्यंत प्राचीन एवं गंभीर गायन शैली है, जिसकी जड़ें वैदिक सामगान तथा मंदिर संगीत परम्परा से जुड़ी मानी जाती हैं।
प्रो. मधु भट्ट तैलंग हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की अग्रणी विदुषियों में गिनी जाती हैं। वे राजस्थान की प्रथम ध्रुपद गायिका के रूप में विशेष रूप से प्रतिष्ठित हैं। वे राजस्थान विश्वविद्यालय में ललित कला संकाय की भूतपूर्व डीन तथा संगीत विभाग की भूतपूर्व विभागाध्यक्षा रह चुकी हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्रतिष्ठित शिक्षाविद् और शोधकर्ता के रूप में उन्होंने संगीतशास्त्र, संगीत शिक्षा तथा भारतीय ज्ञान परम्परा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सेमिनार, संगोष्ठियों तथा व्याख्यानमालाओं में मुख्य वक्ता के रूप में सहभागिता की है तथा भारतीय संगीत की परम्परा, इतिहास और सिद्धांत पर कई शोध-पत्र एवं लेख प्रकाशित किए हैं। इस कार्यशाला का उद्देश्य विश्वविद्यालय के शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को भारतीय गायन परम्परा की समृद्धि, उसकी तकनीकी विशेषताओं तथा महान कला विभूतियों के सांस्कृतिक योगदान से परिचित कराना है। साथ ही इस अमूल्य सांगीतिक धरोहर को समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँचाना भी इसका प्रमुख लक्ष्य है। विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. मांडवी सिंह ने बताया कि विश्वविद्यालय भारतीय संगीत की समृद्ध परम्परा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने हेतु निरंतर ऐसे शैक्षणिक कार्यक्रम आयोजित करता रहेगा, जिससे विद्यार्थियों को उच्च कोटि के गुरुओं से प्रत्यक्ष मार्गदर्शन प्राप्त हो सके। विश्वविद्यालय की कुलसचिव डॉ० सृष्टि धवन ने बताया कि इस प्रकार की कार्यशालाएँ विद्यार्थियों के कौशल विकास के साथ-साथ भारतीय सांगीतिक विरासत के संरक्षण एवं प्रसार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

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