एसएनए के वाल्मीकि रंगशाला में नाटक का मंचन
लखनऊ। दिव्य सांस्कृतिक शैक्षिक एवं सामाजिक संस्था की हास्य नाट्य प्रस्तुति दिल की दुकान का मंचन एसएनए के वाल्मीकि रंगशाला में किया गया। नाटक का लेखन राजेन्द्र कुमार शर्मा और परिकल्पना व निर्देशन संजय त्रिपाठी ने किया है।
नाटक दिल की दुकान में धनीराम एक महाकंजूस व्यक्ति है। वह पानी पीने के लिए भी पत्नी से कहता है कि म्युनिसिपालिटी के नल से लाओ। चीनी के गिरे हुए दाने खोज-खोज कर उन्हें चाय में डालता है। इतना कंजूस है कि कबाड़ी से टूटे कप खरीद कर लाता है। उसकी पत्नी उसकी कंजूसी से बहुत परेशान रहती है। मोहनलाल पत्नी का सताया हुआ एक निरीह पति है। उसकी पत्नी बहुत ही तेजतर्रार है। बात-बात पर उसको डराती रहती है। घर का सारा काम उसी से करवाती है। पति को उसकी मर्जी से कुछ भी नही करने देती। तीसरे मकान में रहने वाली चंदा है तो सीधी-सादी पर उसका पति इतना शराब पीता है कि पूजा के लिए रखे हुए पैसे से भी शराब की बोतल खरीद के ले आता है। इस कारण चंदा उससे हमेशा परेशान रहती है। वह हमेशा अपने आपको कोसती है किस घड़ी में उसकी शादी हुई।
तीनों परेशान परिवारों को सूचना मिलती है कि एक दिल बदलने की दुकान है जहां पर इंसान का दिल बदल दिया जाता है। फिर क्या था कंजूस को शहंशाह का दिल, मोहन की पत्नी को लैला का दिल और शराबी को साधू का दिल लगा दिया जाता है। तीनों अपने स्वभाव के उल्टा व्यवहार करने लगते है लेकिन जब अति होने लगती है तो तीनों परिवार परेशान हो जाते है, अंत में कहते है यह लोग जैसे थे ठीक थे। रंगकर्मी आता है और दर्शकों से कहता है कि चुनाव होने वाले है आप लोग अपना दिल न बदलिये वरना आपके हालात ऐसे हो जायेंगे। चुनाव में न देखो उम्मीदवार की जाति और धर्म । यदि देखना है तो देखो उसकी छवि और कर्म। नाटक में अहम भूमिका अक्षत ऋषि, युआंग गुप्ता, प्रणव श्रीवास्तव, प्रिया यादव, सूर्यमणि त्रिपाठी, काव्या मिश्रा, अनुराग शुक्ला, तनीश सिद्दकी और मीत मिश्रा आदि ने निभायी।





