हमारे मनोभाव, प्रवृत्तियां और सोचने-समझने का दायरा बहुत कुछ हमारे व्यक्तित्व एवं कृतित्व को भी प्रभावित करता है। अगर हमारे मनोभाव, हमारी मनोवृत्तियां सकारात्मक हैं जो इसका सामाजिक कार्य व्यवहार पर भी सकारात्मक असर होता है। हानिकारक आवेशों से मुक्त रहकर यदि मनोवृत्तियों का उपयोग किया जाये तो वे हानि पहुंचाने की बजाय हितकर ही सिद्ध होंगी।
सर्वथा संसार त्यागियों की तो बात छोड़ दीजिए पर अधिकांश मनुष्यों को जो संसार में रहते हैं और जिनको भली बुरी सभी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। सभी मनोवृत्तियों से काम लेना आवश्यक होता है। इसलिए हमारा कर्तव्य यही है कि अपनी मनोवृत्तियों और इन्द्रियों को ऐसी ही सधी हुई अवस्था में रखें।
मनुष्य की जो मनोवृत्तियां जन्म से ही दी गयी हैं, वे सब उपयोगी एवं महत्वपूर्ण हैं। यदि उनको ठीक प्रकार से प्रयोग में लाया जाये तो प्रत्येक व्यक्ति अत्यंत सुख-शांतिपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकता है। हम देखते हैं कि दुर्भाग्यवश लोग उनका सदुपयोग करना नहीं जानते और उन्हें बुरे मार्ग से खर्च करके अपने लिए तथा दूसरों के लिए दुखों की सृष्टि करते हैं। हम देखते हैं कि कई मनोवृत्तियों की संसार में निन्दा होती है। कहा जाता है कि यह बातें पाप और दुख की जड़ है।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि को जी भर कर कोसा जाता है और कहा जाता है कि इन्हीं के कारण संसार में अनर्थ हो रहे हैं। इस प्रकार का कथन किस हद तक सही हैं इसका विचारवान पाठक स्वयं निर्णय कर सकते हैं। यदि काम बुरी वस्तु है, त्याज्य है, पापमूलक है तो उसका उपयोग न तो सत्पुरुषों को ग्राह्य हो सकता था और न बुरी बात का अच्छा परिणाम निकल सकता था। परन्तु इतिहास दूसरी ही बात सिद्ध करता है।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश, विवाहित जीवन व्यतीत करते हैं। व्यास, अत्रि, गौतम, वशिष्ठ, विश्वामित्र, याज्ञवल्क्य, भारद्वाज, च्यवन आदि प्राय: सभी प्रधान ऋषि सपत्नीक रहते थे और संतानोत्पादन करते थे। दुनिया में असंख्य पैगम्बर, ऋषि, अवतार महात्मा, तपस्वी, विद्वान, महापुरुष हुए हैं, यह सब किसी न किसी माता पिता के संयोग से ही उत्पन्न हुए थे।
यदि काम सेवन बुरी बात है तो उसके द्वारा उत्पन्न हुए बालक भी बुरे ही होने चाहिए। बुरे से अच्छे की सृष्टि कैसे हो सकती है? कालोंच से सफेदी कैसे निकल सकती है? इन बातों पर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि काम स्वयं कोई बुरी वस्तु नहीं है। परमात्मा ने अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति मनुष्य में कोई बुरी बात नहीं रखी, काम भी बुरी बात नहीं है। बुरा केवल काम का दुरुपयोग है। दुरुपयोग करने से तो अमृत भी विष बन सकता है।





