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सुप्रीम कोर्ट की चिंता

हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आये हैं जब राज्यपालों एवं विधानसभा अध्यक्षों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे हैं और मामला अंतत: सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से सुलझाया गया। ऐसे में मणिपुर कांग्रेस के विधायक टी. श्याम कुमार की अयोग्यता की याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संसद को सुझाव दिया है कि वह दल-बदल के मामले में विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियों को मर्यादित करने के लिए संविधान की दसवीं अनुसूची में संशोधन कर स्थायी ट्रिब्यूनल स्थापित करे।

साथ ही, अयोग्यता की प्रक्रिया को पूर्ण करने के लिए अधिकतम तीन माह का समय निर्धारित किया जाये। दरअसल विधासभा अध्यक्ष सत्तारूढ़ पार्टी का ही सदस्य होता है, ऐसे में जब वह किसी अर्द्धन्यायिक प्रकृति के मसलों पर फैसला देता है, तो उस पर पक्षपात के आरोप लगते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्षों की शक्तियों को सीमित करने का सुझाव मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष के मामले में सुनवाई करते हुए दिया है।

गौरतलब है कि मणिपुर में 2017 में विधानसभा चुनाव हुए थे। इसमें कांग्रेस पार्टी के विधायक टी श्याम कुमार दल बदल बीजेपी में शामिल हो गये और मंत्री बन गये। जबकि टी श्याम कुमार को अयोग्य घोषित करने के लिए मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष के पास करीब एक दर्जन याचिकाएं विचाराधीन हैं, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष पूरे मामले पर फैसला करने के बजाय इसे लटकाये हुए हैं। इसी मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए स्पीकर की शक्तियों को मर्यादित करने के लिए संसद को सुझाव दिया है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष को एक सप्ताह के भीतर फैसला करने का आदेश भी दिया है और ऐसा न करने पर हस्तक्षेप की बात कही है। बात मणिपुर तक ही सीमित नहीं है बल्कि विधानसभा अध्यक्षों के विवादित फैसलों की एक लंबी फेहरिश्त बनायी जा सकती है। 1997-98 के दौरान उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष के फैसलों पर लगातार सवाल उठते रहे। विधानसभा अध्यक्ष पर दलबदलू विधायकों के सहारे सरकार का बहुमत बनाये रखने में मदद करने का आरोप लगता रहा।

इसी तरह कर्नाटक विधानसभा में पिछले साल विधानसभा अध्यक्ष ने विधायकों के इस्तीफे को लंबे समय तक लटकाये रखा और अंतत: विधायकों को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा। यही नहीं, मुख्यमंत्री के विश्वास प्रस्ताव पर विस अध्यक्ष कई दिनों तक बहस कराते रहे ताकि सरकार किसी तरह रूठे विधायकों को मना ले और बच जाये। जब संविधान बन रहा था तो उसमें विधानसभा अध्यक्ष और राज्यपाल जैसे उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के विवेक पर किसी तरह की मर्यादा नहीं थोपी गयी थी, लेकिन बाद के अनुभव बताते हैं कि प्राय: राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष अपनी शक्तियों, फैसलों एवं सरकार गठन के समय अपने विवेक के प्रयोग में पक्षपात करते हैं।

इसलिए विधानसभा अध्यक्ष की अर्द्ध न्यायिक शक्तियों पर सांविधानिक मर्यादा लगाने के साथ ही राज्यपालों एवं राष्ट्रपति के स्वविवेक पर भी सांविधानिक संशोधन के द्वारा अथवा न्यायिक फैसलों के माध्यम से कुछ मर्यादाएं और कुछ दिशा-निर्देश लागू करने की जरूरत है ताकि सरकार गठन के समय राज्यपाल मनमर्जी करने के बजाय स्थापित मर्यादाओं, परम्पराओं और सांविधानिक उपबंधों और न्यायिक फैसलों के आलोक में ही कोई फैसला करें और फैसले के पीछे के तथ्यों एवं तर्कों को भी जनता के सामने रखें ताकि इतने बड़े सांविधानिक पद पर किसी तरह का सवाल न उठे।

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