पारिवारिक उत्तरदायित्वों को निबाहा जाना चाहिए। लेकिन उसी कीचड़ में इतनी गहराई तक नहीं फंसना चाहिए कि उबर सकना संभव ही न हो सके। मोह को भव बंधनों में से प्रमुख माना गया है। उस संकीर्ण दायरे में जकड़े हुए लोग लोक मंगल का कर्तव्य पलन कर ही नहीं पाते। जिन्हें सभी के प्रति पारिवारिकता का भाव अपनाने का अवसर मिलता है, उनके लिए हर किसी को आत्मीय मानने का, सभी की सेवा सहायता करने का आनन्द मिलता है।
अहंकार मोटे अर्थों में घमंड समझा जाता है। अकड़ कर उद्धत अशिष्ट व्यवहार करने, क्रोध ग्रस्त रहने को अहंकार माना जाता है पर वस्तुत: वह है अधिक सूक्ष्म और व्यापक। आत्मा प्रदर्शन में, ठाट-बाट में बढ़-चढ़ कर अपनी बढ़ाई का रोब जमाना अहंकार का वास्तविक स्वरूप है। फैशन, सज धज श्रृंगार ठाट बाट अपव्यय शेखी, बड़प्पन आदि अहंकार के स्वरूप हैं। लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए बड़प्पन जताने के लिए शेखी खोरी के लिए लोग ढेरों समय, श्रम और पैसा गंवाते हैं।
यह भी एक प्रकार का नशा है जिसमें अपने को भले ही मजा आता हो पर हर विचार शील को इसमें क्षुद्रता की, बचकानेपन की ही गंध आती है। इस विडम्बना के लिए चित्र विचित्र प्रवंचनाएं रचनी पड़ती हैं। ईर्ष्या-द्वैष उत्पन्न करने में भी अहंता की ही प्रमुख भूमिका रहती है। कलह और विग्रह भी प्राय: इसी कारण उत्पन्न होते हैं। अहंकार को आत्म घाती शत्रु माना गया है। ऐसे लोगों से आत्म साधना तो बन ही नहीं पाती। उन पर उदण्डता का भूल और चढ़ा रहता है। अपनी प्रशंसा और दूसरों की निंदा करने में ही ऐसे लोग लगे रहते हैं।
इन परिस्थितियों में आत्मोत्कर्ष और आत्म पारिष्कार का आधार कैसे बन पड़े? लोभ मोह और अहंकार के तीन भारी पत्थर जिसने सिर पर लाद रखे हों उसके लिए जीवन साधना की लंबी और ऊंची मंजिल पर चल सकना, चढ़ सकना असंभव हो जाता है। भले ही कोई कितने ही पूजा पाठ करते रहें, जिन्हें तथ्यान्वेषी बनाना है उन्हें इन तीन शत्रुओं से कैसे भी अपना पीछा छुड़ाना ही चाहिए।
हल्की वस्तुएं पानी पर तैरती हैं किन्तु भारी होने पर डूब जाती हैं। जो लोभ मोह और अहंकार के भारी पत्थर अपनी पीठ पर लादे हुए हैं उन्हें भव सागर में डूबना ही पड़ेगा। जिन्हें तरना है, तैरना है, उन्हें इन तीनों भारों को उतारने का प्रयत्न करना चाहिए। अनेकानेक दोष, दुर्गुणों कषाय कल्मषों का वर्गीकरण विभाजन करने पर उनकी संख्या सैकड़ों हजारों हो सकती है पर उनके मूल उद्गम तीन ही हैं। लोभ मोह और अहंकार। इन्हीं भव बंधनों से मनुष्य के स्थूल, कारण शरीर कैद पड़े हैं।





