व्हाट्सऐप पर एक वीडियो आया, देखकर दिल रो पड़ा-एटा (उत्तर प्रदेश) में एक व्यक्ति अपनी 15-वर्षीय बलात्कार पीड़ित बेटी को कमर पर लादे हुए महिला अस्पताल में जांच के लिए ले जा रहा है। व्यक्ति को स्ट्रेचर या व्हीलचेयर उपलब्ध नहीं करायी गई। लड़की को उसके 19-वर्षीय पड़ोसी लड़के ने अपने कमरे में घसीट लिया था और उसके साथ कई घंटे तक जबरन दुष्कर्म किया।
लड़की ने बचने का प्रयास किया तो उसकी टांग टूट गई। देश में निरंतर बढ़ती बलात्कार की घटनाओं में यह सबसे ताजा है, साथ ही इसमें वीभत्सता की एक नई कड़ी जुड़ी नजर आ रही है। 2017 में राष्टÑीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार बलात्कार के 32,559 मामले दर्ज हुए थे। इन घटनाओं ने सुप्रीम कोर्ट को भी चिंतित कर दिया है। इसलिए उसने स्वत: ही 18 दिसम्बर 2019 को यौन अपराधों की प्रतिक्रिया में आपराधिक न्याय व्यवस्था के मूल्यांकन हेतु संज्ञान लिया।
निर्भया गैंग रेप व मर्डर में एक दोषी की मौत की सजा की समीक्षा याचिका को ठुकराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाल के दिनों में ऐसी घटनाओं में देर से मिलने वाले न्याय ने जनता के मन में आंदोलन, एंग्जायटी व बेचैनी पैदा की है। इसलिए मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडेÞ की खंडपीठ ने सभी राज्यों व सभी हाईकोर्ट्स से 7 फरवरी 2020 तक ऐसे मामलों में स्टेटस रिपोर्ट मांगी है। इन रिपोर्टों में स्पीडी ट्रायल से संबंधित 12 पहलुओं (जिनमें 46 प्रश्न हैं) पर स्टेटस मांगा गया है, जैसे जांच, साक्ष्य एकत्र करना, फरेंसिक व मेडिकल साक्ष्य, पीड़ित के बयान की रिकर्डिंग, ट्रायल की समयावधि (जो दो माह होनी चाहिए), निर्भया फंड का उपयोग आदि।
जाहिर है इस डाटा की रोशनी में सुप्रीम कोर्ट बलात्कारों पर नियंत्रण का मार्ग तलाश करना चाहता है और यह भी जानना चाहता है कि निर्भया कांड के बाद जो आपराधिक कानून में संशोधन किया गया था, आखिर उसके इच्छित नतीजे बरामद क्यों नहीं हुए? यह काम तो देश की संसद का है, लेकिन वह ऐसे मुद्दों पर गंभीरता से विचार करने की बजाय, जो घटना अधिक चर्चित हो जाये उस पर बस शोर मचाती है, जैसा हाल ही में हैदराबाद की घटना पर हुआ, जिसमें एक 27-वर्षीय पशु चिकित्सक को सामूहिक बलात्कार के बाद जलाकर मार दिया गया था।





