भारत की धरती स्त्रियों के त्याग एवं बलिदान की गाथाओं से भरी है। नारी ने हर युग में अपनी विद्वता, प्रतिभा एवं त्याग से यह साबित किया है कि उसका स्थान समाज में पुरुषों से कहीं भी किसी मायने में कमतर नहीं है। नारी ने अपनी विद्वता से समाज को शिक्षा दी है, अपनी वीरता और पराक्रम से बड़े-बड़े युद्धों में विजयश्री हासिल की और अपने त्याग एवं बलिदान से पति और परिवार की रक्षा करने का इतिहास काफी पुराना है।
ऐसी त्यागी, पराक्रमी, विदुषी, धर्मपरायण नारियों का आज भी दुनिया में गौरवगान होता है। भगवान श्रीकृष्ण की अर्धांगिनी सत्यभामा ने द्रोपदी से प्रश्न किया- हे द्रौपदी! कैसे तुम अति बदलशली पाण्डु पुत्रों पर शासन करती हो? वे कैसे तुम्हारे आज्ञाकारी हैं तथा तुमसे कभी कुपित नहीं होते? तुम्हारी इच्छाओं के पालन हेतु सदैव प्रस्तुत रहते हैं। मुझे इसका कारण बतलाओ। द्रौपदी ने उत्तर दिया- हे सत्यभामा! पाण्डु पुत्रों के प्रति मेरे व्यवार को सुनो- मैं अपनी इच्छा, वासना तथा अहंकार को वश में कर अति श्रद्धा एवं भक्ति से उनकी सेवा करती हूं।
मैं किसी अहंकार-भावना से उनके साथ व्यवहार नहीं करती। मैं बुरा और असत्य भाषण नहीं करती। मेरा हृदय कभी किसी सुंदर युवक, धनवान या आकर्षण पर मोहित नहीं होता। मैं कभी नहीं स्नान करती, खाती अथवा सोती जब तक कि पति नहीं स्नान कर लेते, खा लेते अथवा सो जाते एवं तब तक जब तक कि हमारे समस्त सेवक तथा अनुगामी नहीं स्नान कर लेते, खा लेते या सो जाते। जब कभी भी मेरे पति क्षेत्र से, वन से या नगर से लौटते हैं, तो मैं उसी समय उठ जाती हूं। उनका स्वागत करती हंू तथा उनको जलपान कराती हूं। मैं घर के सामान तथा भोजन को सदैव स्वच्छ एवं क्रम में रखती हूं।
सावधनी से भोजन बनाती तथा ठीक से परोसती हूं। मैं कभी भी कठोर शब्द नहीं बोलती। कभी भी अनुलाओं का अनुसरण नहीं करती। मैं वहीं करती हूं जो उनको रुचिकर तथा सुखकर लगता है। कभी भी आलस्य तथा सुस्ती नहीं दिखाती। बिना विनोदावसर के नहीं हंसती। मैं द्वार पर बैठ कर व्यर्थ समय नष्ट नहीं करती। मैं क्रीड़ा-उद्यान में व्यर्थ नहीं ठहरती, जबकि मुझे अन्य काम करने होते हैं। जोर-जोर से हंसना, भावुकता तथा अन्य इसी प्रकार अप्रिय लगने वाली वस्तुओं से अपने को बचाती एवं सदैव पति-सेवा में रत रहती हूं।
पति-बिछोह मुझे कभी नहीं सुहाता। जब कभी मेरे पति मुझे छोड़कर बाहर जाते हैं तो मैं सुगन्धित पुष्पों तथा अंगराग का प्रयोग न कर जीवन कठोर तपस्या में बिताती हूं। मेरी रुचि अरुचि, मेरे पति की रुचि-अरुचि ही है और उन्हीं की आवश्यकतानुसार अपना समायोग करती हूं। मैं प्राण-प्रण से अपने पति की भलाई चाहती हूं। मेरे पति मेरे मार्गदर्शक हैं। मैं परिवार की एक संरक्षक की तरह सबके प्रति समर्पित होकर काम करती हूं।





