छोटे से लेकर बड़ों ने मगरिब की नमाज अदा की
लखनऊ। सहरी का मजा, इफ्तार की लज्जत, जिक्र, शुक्र, सब्र, नेमत, रहमत, कुरआन शरीफ की तिलावत, नमाज का वसूल, रोजे की रूहानियत का प्रतीक माह-ए-रमजान के दूसरे दिन रोजेदारों ने पूरे दिन अल्लाह की इबादत में गुजारे। शाम को रोजा इफ्तारी के साथ रोजेदारों ने रोजा खोला और खुदा का शुक्र अदा किया। चारों तरफ रमजान की रौनक है। बुधवार की सुबह लोगों ने मिलकर सहरी खाई। तहज्जुद की नमाज पढ़ने के बाद फज्र की नमाज अदा की। कुरआन शरीफ की तिलावत की। तस्बीह व दुआ में अल्लाह की हम्दो सना बयान की। मस्जिदों में दरूदो सलाम पढ़ा गया। सुबह से ही लोग इबादत में मसरूफ हुए तो यह सिलसिला देर रात तक चलता रहा। शहर की हर मस्जिद में नमाजिÞयों का तांता लगा रहा। शाम को सभी ने एक साथ दस्तरख्वान पर रोजा अफ्तार किया।
मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने बताया कि रमजान के तीस दिनों को तीन हिस्सों में बांटा गया है यानी रहमत, मगफिरत, जहन्नम से आजादी। पहला अशरा रहमत का चल रहा है, इसलिए सभी अल्लाह तआला की रहमत से मालामाल होना चाह रहे हैं। जोहर की नमाज के बाद लोगों ने बाजार की तरफ रुख किया। इफ्तारी के तमाम सामानों की खरीदारी की। इसके बाद घरों में महिलाओं ने इफ्तार के विभिन्न पकवानों को बनाना शुरू किया। असर की नमाज घरों व मस्जिदों में अदा की गई। इफ्तार तैयार होने के बाद मुसाफिरों व गरीबों के लिए मस्जिदों में भेजी गई। पास पड़ोस में भी इफ्तार भेजी गई। शाम को सभी ने एक दस्तरख्वान पर इफ्तार कर, दुआ मांगी। तरह-तरह के खजूर, चिप्स, चना, शरबत, पकोड़ियां व फल वगैरा ने दिन भर की भूख को गायब कर दिया। इफ्तार करने के बाद छोटे से लेकर बड़ों ने मगरिब की नमाज अदा की। थोड़ा आराम किया फिर रात में इशा, तरावीह, वित्र एवं नफ्ल नमाज पढ़ी। यह नजारा पूरे माह इसी तरह बरकरार रहेगा।
उलेमाओं ने बतायी रमजान की फजीलत
-काजी मुफ्ती इरफान मियां फरंगी महली ने बताया कि रोजा रखने में बहुत सी हिकमतें है रोजा रखने से भूख और प्यास की तकलीफ का पता चलता है। जिससे खाना-पानी की कद्र मालूम होती है और इंसान अल्लाह का शुक्र अदा करता है। रोजा से भूखों और प्यासों पर मेहरबानी का जज्बा पैदा होता है क्योंकि मालदार अपनी भूख याद करके गरीब मोहताज की भूख का पता लगाता है। रोजा से भूख के बर्दाश्त करने की आदत पड़ती है। अगर कभी खाना मयस्सर न हो तो घबराता नहीं और अल्लाह की नाशुक्री नहीं करता।
-मौलाना सैफ अब्बास नकवी ने बताया कि रमजान के महीने में नेकी करने वालों को बहुत अधिक सवाब मिलता है। रोजेदार अपनी दिनचर्या में अधिक से अधिक अल्लाह का जिक्र और जकात व अन्य सदका खैरात करें। लोगों को इस माह अपने अंदर के गुस्से को निकाल देना चाहिए। यह एक तरह से प्रशिक्षण का माह होता है। रोजा रखकर दूसरे की भूख का अहसास होता है इसलिए तमाम मुसलमानों को चाहिए कि अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए खुशदिली से रोजा रखें और अल्लाह के इनाम के हकदार बनें।





