दुनिया में जब आतंकवाद और आंतरिक सुरक्षा की चुनौती दिनोंदिन जटिल होती जा रही है। आतंकवाद के नये-नये रूप सामने आ रहे हैं और रक्तबीज की तरह एक आतंकी के खत्म होने पर हजार पैदा हो रहें हैं, तब गृहमंत्री अमित शाह का पांच साल में आतंकवाद, नक्सलवाद और अलगाववाद को पूरी तरह खत्म करने का संकल्प चुनौतीपूर्ण है, लेकिन आश्वस्त भी करता है कि सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्ध है। हाल के वर्षों में अमित शाह की छवि ऐसे नेता के रूप में उभरी है, जो चुनौतियों से बचने के बजाय उलझने हैं और सफलता भी हासिल करते हैं।
अमित शाह की भूमिका वैसे तो मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल में भी अति महत्वपूर्ण थी, लेकिन मोदी 2.0 में वे गृहमंत्री हैं। गृहमंत्री के रूप में अमित शाह का अब तक जो ट्रैक रिकार्ड रहा है उससे यह भरोसा बढ़ता भी है कि शाह ने संकल्प लिया है तो यह संभव है। पिछले छह महीने के कार्यकाल में अमित शाह ने दृढ़ता के साथ देश की जटिलतम समस्याओं के समाधान के लिए जो हौसला दिखाया है, उससे एक बात स्पष्ट है कि चाहे आतंकवादी हों, नक्सली हों या आलगाववादी, सबके मन में अमित शाह के गृहमंत्री बनने पर एक अदृश्य डर व्याप्त हो गया है।
इसका कारण यह है कि अमित शाह गुजरात में लंबे समय तक गृहमंत्री थे और इस दौरान उन्होंने आतंकवाद और साम्प्रदायिक हिंसा को बड़ी दृढ़ता के साथ खत्म किया था। आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति के चलते उन पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के गंभीर आरोप भी लगे, लेकिन इससे वे विचलित नहीं हुए। केन्द्रीय गृहमंत्री के रूप में उनका पहले छह महीने का कार्यकाल ऐतिहासिक सफलताओं से भरा है। आतंकवाद पर सख्त प्रहार करने वाला यूपीपीए कानून, तीन तलाक पर रोक, धारा 370 का खात्मा, कश्मीर राज्य का विभाजन, नागरिकता संशोधन कानून के साथ अयोध्या पर अदालत का फैसला आना भी सरकार की सफलता के रूप में ही देखा जा रहा है।
छह माह में उपलब्धियों की लंबी फेहरिश्त के बाद अगर शाह पांच साल में आतंकवाद और नक्सलवाद खत्म करने की बात करते हैं, तो इस पर भरोसा न करने का कोई कारण नहीं है। वैसे भी मोदी सरकार का टैÑक रिकॉर्ड आतंकवाद के मामले में बहुत बेहतर रहा है। हालांकि इस दौरान पठानकोट, उरी और पुलवामा जैसे बड़े आतंकी हमले हुए, लेकिन आतंकवाद मूलत: कश्मीर के ईर्द-गिर्द की केन्द्रित रहा। कश्मीर को छोड़कर देश के किसी अन्य हिस्से में बड़ी आतंकी घटना नहीं हुई। अमित शाह के गृहमंत्री बनने के बाद ही आतंकवाद के खिलाफ कठोर कानून यूपीपीए लाया गया और एनआईए को और ताकतवर बनाया गया। ऐसे में अब सरकार के पास आतंकवाद से लड़ने के लिए पर्याप्त कानूनी, तकनीकी हथियार के साथ संसाधन भी मौजूद हैं। इसलिए आतंकवाद से लड़ने का संकल्प उचित है, लेकिन इसमें ध्यान रखना होगा कि मानव अधिकारों का हनन कम से कम हो और बेगुनाहों को परेशान न होना पड़े।





