पुलिस और अपराधियों के बीच गठजोड़ बहुत पुराना है और यह समय-समय पर बहुत वीभत्स रूप में उजागर भी होता रहा है। नब्बे के दशक में पूर्व गृह सचिव एनएन वोहरा कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में नेताओं, अधिकारियों और माफिया तंत्र के बीच मजबूत गठजोड़ का खुलासा करते हुए इसे खत्म करने का सुझाव दिया था लेकिन इसे मानने की बात तो दूर रिपोर्ट आने के बाद शायद ही कभी उस पर गौर किया गया हो।
अपराधियों और पुलिस के बीच गठजोड़ इतना मजबूत है कि प्रत्येक माफिया के बढ़ने और पनपने के पीछे कहीं न कहीं कोई पुलिस खड़ी होती है। जब यह गठजोड़ वीभत्स रूप में सामने आता है तब कुछ दिनों तक चर्चा होती है और बाद में सब सामान्य हो जाता है।
कानपुर देहात में माफिया सरगना विकास दुबे के घर दबिश देने गयी पुलिस टीम पर हमला और आठ पुलिस कर्मियों की शहादत व सात अन्य के घायल होने के बाद जिस तरह से पुलिस और इस माफिया के बीच गहरे संबंधों का खुलासा हो रहा है उससे एक बात स्पष्ट है कि आठ पुलिस कर्मियों की शहादत के लिए जितना दोषी माफिया विकास दुबे है उतना ही जिम्मेदार पुलिस तंत्र है जो इस अपराधी के पीछे खड़ी रही और पर्दे के पीछे इसकी मदद कर जरायम के साम्राज्य को बढ़ने दिया।
जरा सोचिए आठ पुलिसकर्मियों की शहादत के बाद जिस तत्परता से इसे खोजने का अभियान पुलिस ने छेड़ा है, घटना के दो दिनों के अंदर जरायम की काली कमाई से खड़े किये गये आलीशन घरों को जमींदोज कर दिया गया उसी तत्परता से अगर पुलिस ने तब भी काम किया होता जब विकास दुबे ने राज्यमंत्री की हत्या की थी, स्कूल प्रबंधक की हत्या की थी या व्यवसायी की हत्या की थी, तो विकास दुबे का माफिया तंत्र इतना फैलता ही नहीं और न ही दोषियों को सजा दिलाने के लिए पुलिस को अपने बीच के ही लोगों की हिस्ट्रीशीट तलाशनी पड़ती।
विकास दुबे को बड़ा अपराधी बनाने, जरायम के साम्राज्य को विस्तृत करने और पुलिस टीम पर हमले से लेकर भगाने-बचाने तक में पुलिसकर्मियों पर ही शक की सुई घूम रही है। इससे स्पष्ट है कि इस अपराधी के काले कारोबार में कहीं न कहीं ये बचाने वाले भी भागीदार हैं। इसलिए विकास दुबे की गिरफ्तारी और सजा देना इस पूरे प्रकरण का मात्र एक पक्ष है, लेकिन कानून का राज तो तब कायम होगा जब कानून देखभाल करने वाले कानून का सम्मान करना सीखेंगे।
प्रदेश में हर थाने में दो-चार माफिया मिल जायेंगे जिनकी पहुंच सभी दलों के स्थानीय नेताओं तक है और इनका धंधा पुलिस एवं प्रशासन के लोगों की मिलीभगत से ही चलता है। इसलिए यह जरूरी है कि अपराधियों एवं पुलिस के इस नापाक गठजोड़ को ही खत्म किया जाये ताकि कानून सही रूप में काम कर सके। कानून को लागू करने वाले ही अगर कानून के दुश्मन बने रहेंगे तो एक विकास के रहने या जाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
जरूरत है समस्या की जड़ पर प्रहार करने की और इसकी शुरूआत के लिए यह अच्छा मौका है। पुलिस के पास हर छोटे-बड़े अपराधी की पुख्ता जानकारी होती है और अगर पुलिस ईमानदारी से काम करे तो कानून व्यवस्था जो आज की सबसे बड़ी समस्या है इसे कुछ ही दिनों में दुरुस्त किया जा सकता है। लेकिन शायद ही कभी पुलिस अपनी तरफ से पहल कर माफियाओं के खिलाफ अभियान चलाती हो। जब कोई बड़ी घटना हो जाती है या ऊपर से आदेश आता है तो कुछ दिन दिखावे की कार्रवाई होती है। ऐसे पाखंड से न कानून व्यवस्था सुधरेगी और न माफिया खत्म होंगे।





