प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद के उच्च सदन राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई व्यापक चर्चा का जवाब देते हुए एक बार फिर जिस तरह उन्होंने किसानों की समस्याओं की चर्चा करते हुए एमएसपी को जारी रखने का आश्वासन दिया, कृषि सुधार कानूनों का समर्थन किया और खुले दिल से बातचीत का प्रस्ताव आंदोलनकारीसंगठनों को दिया है, उससे स्पष्ट है कि सरकार जहां एक तरफ कृषि विकास के प्रति प्रतिबद्ध है वहीं अगर कानून एवं सरकारी नीति में कोई कमियां हैं, कोई आपत्ति है, तो उसका समाधान भी करने के लिए तत्पर है।
सरकार के मंत्रियों ने बार-बार और प्रधानमंत्री ने भी दो बार कृषि कानूनो पर चर्चा करने और कमियों को दूर करने की बात कही है। इसलिए किसान संगठनों को इसे नाक का सवाल बनाने के बजाय किसानों के हित में एक बेहतर कानून के निर्माण में मदद करनी चाहिए। दरअसल जब सरकार बार-बार चर्चा करने की बात करती है, कमियां बताने की बात है, तब अगर जिद पकड़ कर किसान संगठन बैठ जायेंगे तो इससे किसानों का बहुत नुकसान होगा। वैसे भी कृषि सुधार समय की जरूरत है। समय-समय पर अनेक सरकारों, एक्सपर्ट पैनल और डा. एस स्वामीनाथन कमेटी ने भी कृषि सुधारों को लागू करने की बात कही है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या आंदोलन कर रहे किसान संगठनों के नेता जो कह रहे हैं वही सही है।
यह सही है कि विरोध भी लोकतंत्र का हिस्सा होता है और इसलिए सरकार को विरोध का सम्मान करना चाहिए। लेकिन अगर विरोध बेकार के मुद्दों पर होगा, निजी हठ को साधने के लिए होगा, विरोध के नाम पर देश के आंतरिक मामलों पर अंतर्राष्ट्रीय सेलेब्रिटी विचार रखेंगे, तो ऐसे विरोध पर हजार सवाल भी उठेंगे। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में जिस तरह गणतंत्र दिवस पर विरोध के नाम पर तांडव हुआ उसके बाद पूरा देश किसान संगठनों के खिलाफ था। सरकार चाहती तो पल भर में ऐसे विरोध को छिन्न-भिन्न कर देती, लेकिन सरकार ने विरोध की मर्यादा रखी है।
पुलिस ने जरूरत से ज्यादा संयम दिखाया है। अगर किसान संगठन इसे सरकार की कमजोरी मानते हैं, तो निश्चित रूप से यह उनका भ्रम है। इस सरकार ने ऐसे-ऐसे फैसले चुटकियों में किये हैं जो आजादी के बाद से ही नासूर बने हुए थे। इसलिए किसान आंदोलन इस सरकार के लिए कोई बड़ा संकट है या आंदोलन से सरकार कमजोर होगी ऐसा सोचना ठीक नहीं है। लेकिन सरकार को लोकतांत्रिक विरोध का सम्मान करना चाहिए और आंदोलन कर रहे संगठनों को भी ऐसा हठ नहीं करना चाहिए जो लोकहित के प्रतिकूल हो।
आखिर सरकार कोई कानून वापस क्यों ले? जब सभी यह कहते हैं कि कृषि सुधार की जरूरत है तो जो सुधार किये गये हैं उन्हें क्यों वापस लिया जाये? अगर उसमें कोई कमी है तो दुरुस्त करने की बात सरकार कर ही रही है। इसलिए किसान संगठनों को अपनी जिद छोड़नी चाहिए और परस्पर संवाद के जरिए कृषि सुधार कानूनों को बेहतर बनाना चाहिए। आंदोलन की भी एक सीमा होती है। अगर बहुत लंबे समय तक आंदोलन खींचने की जिद किसान संगठन करते रहे तो इसका भी हश्र एनआरसी के आंदोलन जैसा ही होगा।





