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डगर चलत देखो श्याम… पर दिखा कथक का मनमोहक रूप

ग्रीष्मकालीन कार्यशाला के समापन दिवस पर बच्चों की सशक्त एवं भावनात्मक प्रस्तुतियों ने मोहा मन
लखनऊ। भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय, लखनऊ में संचालित ग्रीष्मकालीन मासिक कार्यशाला के अंतर्गत आज दिनांक 25 जून 2026 को आयोजित समापन दिवस पर प्रतिभागियों द्वारा अत्यंत भव्य, आकर्षक एवं सुव्यवस्थित प्रस्तुतियाँ दी गईं। विद्यार्थियों ने कार्यशाला के दौरान अर्जित कौशल एवं कलात्मक दक्षता का प्रभावशाली प्रदर्शन करते हुए उपस्थित दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ समापन दिवस के मुख्य अतिथि, सुप्रसिद्ध शास्त्रीय एवं सुगम संगीत गायक युगांतर सिंदूर, विश्वविद्यालय की पूर्व कुलसचिव डॉ. सृष्टि धवन, वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी किरीट राठौड़, विश्वविद्यालय के तालवाद्य विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज कुमार मिश्र, नृत्य विभागाध्यक्ष ज्ञानेन्द्र दत्त बाजपेई एवं सहायक आचार्य (नृत्य) सुश्री मंजुला पंत द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलन कर किया गया।
कार्यक्रम की प्रस्तुतियों का क्रम अत्यंत आकर्षक एवं विविधतापूर्ण रहा। सर्वप्रथम भरतनाट्यम नृत्य की प्रस्तुति वैष्णवी मिश्रा के निर्देशन में हुई, जिसमें प्रतिभागियों ने पुष्पांजलि, श्लोक एवं दीप नृत्य के माध्यम से अपनी साधना एवं भावाभिव्यक्ति का सुंदर प्रदर्शन किया। इसके पश्चात लोक नृत्य की श्रेणी में मोहित कपूर के प्रशिक्षण में अयोध्या के कनक भवन में गीत पर आधारित अवधी लोकनृत्य प्रस्तुत किया गया, जिसने दर्शकों को लोक संस्कृति की मधुरता से अभिभूत कर दिया।
कथक नृत्य की प्रस्तुति विश्वविद्यालय के वरिष्ठ गुरु पंडित राम मोहन महाराज के मार्गदर्शन में संपन्न हुई, जो ॐ नम: शिवाय से आरंभ होकर ठाट, टुकड़े एवं तिहाइयों की मनोहारी संरचना के साथ ठुमरी डगर चलत देखो श्याम पर प्रभावपूर्ण समापन तक पहुँची। शास्त्रीय गायन में प्रखर पांडेय के निर्देशन में राग जौनपुरी की बंदिश पायल की झंकार प्रस्तुत की गई, जिसने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। वाद्य संगीत की श्रेणी में मनोज कुमार के निर्देशन में सितार वादन की मधुर प्रस्तुति दी गई, जिसमें राग काफी में मध्यलय का सुसंयोजित एवं प्रभावपूर्ण निर्वाह किया गया। सुगम संगीत में नमन सिंह की स्वनिर्मित रचना जब हृदय समर्पित होता है ने विशेष प्रभाव छोड़ा। गजल गायन में अंजली पटेल के निर्देशन में बशीर बद्र की गजल कहीं चाँद राहों में खो गया को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया।
विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. मांडवी सिंह ने सभी का अभार व्यक्त करते हुए बताया कि ग्रीष्मकालीन कार्यशालाएँ विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास, आत्मविश्वास वृद्धि एवं रचनात्मक अभिव्यक्ति को सशक्त बनाने का अत्यंत प्रभावी मंच हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य भारतीय शास्त्रीय एवं लोक कलाओं की समृद्ध परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुँचाना है, ताकि युवा वर्ग अपनी जड़ों से जुड़ा रहे और वैश्विक मंच पर भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व कर सके। उन्होंने सभी प्रशिक्षकों के समर्पण एवं विद्यार्थियों के अनुशासन और परिश्रम की सराहना करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
विश्वविद्यालय के कुलसचिव एस.पी. सिंह ने बताया कि इस प्रकार की कार्यशालाएँ विद्यार्थियों में अनुशासन, समयबद्धता, समर्पण एवं टीम भावना का विकास करती हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का प्रयास है कि विद्यार्थियों को केवल शैक्षणिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक एवं सांस्कृतिक अनुभव भी प्रदान किया जाए। उन्होंने सभी प्रतिभागियों के उत्कृष्ट प्रदर्शन की सराहना करते हुए भविष्य में और अधिक ऐसे रचनात्मक आयोजनों के आयोजन की प्रतिबद्धता व्यक्त की। समापन अवसर पर सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र प्रदान कर उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन एवं सक्रिय सहभागिता के लिए सम्मानित किया गया। इस दौरान प्रतिभागियों में विशेष उत्साह एवं गर्व का वातावरण देखने को मिला। कार्यक्रम का सफल संयोजन कार्यक्रम संयोजकों डॉ. मनोज कुमार मिश्र एवं डॉ. ज्ञानेन्द्र दत्त बाजपेई के कुशल निर्देशन में सम्पन्न हुआ। कार्यशाला समापन कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षक, कर्मचारी, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम में मंच संचालन विश्वविद्यालय की अतिथि शिक्षिका (गायन) डॉ. कृतिका त्रिपाठी द्वारा किया गया। कार्यक्रम का समापन सभी प्रतिभागियों को बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाओं के साथ हुआ।

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