कार गिल विजय की शौर्यगाथा रोमांचित करती है। विषम परिस्थिति में हमारे जवानों ने पचास दिनों तक अदम्य शौर्य का परिचय देकर 26 जुलाई 1999 को दुनिया के सबसे ऊंचे एवं जटिल युद्ध क्षेत्र में विजय प्राप्त कर कारगिल की चोटियों पर तिरंगा लहराया था।
कारगिल युद्ध एवं उससे पूर्व 1971, 1965 एवं 1948 में पाकिस्तान के साथ और 1967, 1962 एवं हाल ही में गलवान में चीन के साथ जो सैन्य टकराव हुआ उसका परिणाम हमारे पक्ष में रहा हो या प्रतिकूल, लेकिन एक बात पत्थर पर खिंची लकीर की तरह सत्य है कि हमारे जवानो ने हमेशा अदम्य शौर्य एवं बलिदान का प्रदर्शन किया।
युद्ध में भी सभी नियमों, कानूनों एवं संधियों का पालन करते हुए दुश्मन को सबक सिखाया। हाल ही में गलवान में चीन के सैनिकों ने जब घात लगाकर हमला किया तब भी भारतीय जवानों ने गोली न चलाने की संधि का पालन किया और दुश्मन को सबक भी सिखाया। आजादी के बाद भारत ने पाकिस्तान के साथ छोटे-बड़े करीब आधा दर्जन युद्ध किए हैं। जबकि चीन के साथ भी छोटे-बड़े तीन युद्ध करने पड़े हैं।
भारत ने जितने भी युद्ध लड़े, उनमें एक बात बहुत स्पष्ट है कि प्राय: युद्ध की कीमत भारत को अधिक चुकानी पड़ी है और यह हमारे राजनीतिक नेतृत्व के कारण हुआ। बार-बार सेना के शौर्य से मिली विजय को कूटनीतिक दांव-पेंच में हम गंवाते रहे। कारगिल विजय इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि घुसपैठियों की शक्ल में, देश में घुस आयी पाकिस्तानी सेना को नुकसान पहुंचाने के साथ देश की सीमा से बाहर खदेड़ दिया गया।
कारगिल की 18000 फीट ऊंची पहाड़ियों पर दुनिया का सबसे जटिल युद्ध लड़ा गया और घुसपैठियों द्वारा कब्जा की गयी एक-एक इंच जमीन मुक्त करायी गयी। इससे पहले 1948 में भी पाकिस्तान कश्मीर में घुस आया और जहां तक घुसा, वहां तक की जमीन पर काबिज हो गया, जिसे आज पीओके कहते हैं। भारत-पाक युद्ध ने देश को कई सबक दिये हैं। सबसे पहले तो यह कि युद्ध के मैदान में जीत के साथ बेहतरीन कूटनीति की भी जरूरत होती है।
कारगिल युद्ध से पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने के लिए बस से लाहौर गये थे। दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की उपस्थिति में लाहौर घोषणा पत्र पर दस्तखत किये गये जिसमें यह सहमति बनी कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय मुद्दा है जिसे आपसी संवाद से हल किया जायेगा।
लाहौर डिक्लरेशन के बाद संभवत: कारगिल में सीमाओं की निगरानी में कहीं न कहीं लापरवाही बरती गयी जिसका फायदा उठाकर पाकिस्तानी सेना देश में घुस आयी। कारगिल पर कब्जे का खुलासा भी किसी सरकारी एजेंसी ने नहीं किया था बल्कि 3 मई 1999 को कुछ चरवाहों ने देखा और इसकी जानकारी सेना को दी।
कारगिल युद्ध दरअसल पाक पर भरोसा और सीमाओं की निगरानी में बरती गयी शिथिलता का परिणाम है। आज भी लद्दाख में चीन कब्जे के फिराक में है और एलएसी पर कई जगह अवैध रूप से काबिज होकर सैन्य जमावड़ा कर रहा है। भारत की रक्षा चुनौतियां बहुत जटिल हैं। चीन-पाकिस्तान जैसे दुश्मन हाथ मिला रहे हैं।
ऐसे में एक बेहतरीन कूटनीति के जरिये अंतर्राष्ट्रीय समर्थन हासिल करने के साथ रूस, अमरीका, इजराइल, फ्रांस जैसे देशों से आधुनिक रक्षा प्रौद्योगिकी हासिल कर देश की सेना को हमेशा मजबूत करने की जरूरत है। सेना के आधुनिकीकरण में पूर्व में बहुत लापरवाही व भ्रष्टाचार हुए हैं और इसकी कीमत भी देश को चुकानी पड़ी है। कारगिल विजय दिवस पर सेना को और ताकतवर बनाने, सैन्य खरीद में भ्रष्टाचार और राजनीति को पूरी तरह से खत्म करने का संकल्प देश को लेना चाहिए।





