नदी, तालाब, पेड़-पौधे और सघन हरियाली मनुष्य के जीवन के लिए उतना ही जरूरी है जितना भोजन, पानी और ऑक्सीजन। इसे जागरुकता की कमी कहें या मनुष्य का स्वार्थ, बढ़ती आबादी के साथ जब नदी, जंगल, तालाब आदि का तहस-नहस कर कंक्रीट की इमारतें खड़ी की जाने लगीं। प्रकृति को रौंदने की यह कू्रर आंधी इतनी तेज चली कि आज जल संचय के महत्वपूर्ण स्रोत नदी और तालाब लुप्तप्राय हो गये। उत्तर प्रदेश में ही बड़ी संख्या में नदियों का अस्तित्व खत्म हो गया। गांव, कस्बों में जल संचय के महत्वपूर्ण स्रोत तालाब खत्म हो गये। लोगों ने तालाबों को पाटकर घर बना लिये। शहरों में पॉपर्टी डीलरों ने तालाबों को बराबर कर प्लाटिंग कर दी गयी। लखनऊ में ही एक हजार से अधिक तालाब जो चार-पांच दशक पहले हुआ करते थे और वर्षा के जल को अपने में समाहित कर धरती को तर करते थे, वे खत्म हो गये। ऐसे तालाबों को आज ढूढ़ना मुश्किल है क्योंकि उनके ऊपर बहुमंजिली इमारतें आबाद हैं।
नदियों, तालाबों के अस्तित्व को खत्म करने का कुपरिणाम सामने है। प्रदेश के करीब 200 से अधिक ब्लॉक पानी के लिहाज से डॉर्क जोन के रूप में चिन्हित हो चुके हैं। अर्थात यहां जल स्तर इतना नीचे चला गया है कि सिंचाई और पेयजल के लिए पानी का मिलना कठिन है। जहां पानी आसानी से उपलब्ध है वहां भी साल-दर-साल जलस्तर नीचे जा रहा है। सिंचाई और पेयजल के लिए हर साल नल व नल कूपों की बोरिंग रिबोर कर गहरा करना पड़ता है ताकि पानी निकल सके। आसन्न जल संकट के मद्देनजर समझदारी इसी में है कि एक तो जल की बर्बादी पर पूरी तरह से रोक लगायी जाये और वर्षा जल के बूंद-बूंद का संरक्षण कर उनको तालाबों, नदियों के माध्यम से जमा किया जाये और पेयजल व सिंचाई के लिए उपयोग किया जाये। तालाब भरे रहेंगे तो जमीनें तर होगीं और जलस्तर जो पाताल की तरफ जा रहा है, उसमें सुधार होगा और आसानी से जल की जरूरतें पूरी हो सकेंगी।
प्रदेश सरकार जलसंरक्षण एवं संचयन के इन स्रोतों को बचाने और विकसित करने के लिए मनरेगा का इस्तेमाल कर रही है। मनरेगा के बजट से तालाबों और नदियों का उद्धार कर उनमें जलग्रहण की क्षमता विकसित की जाती है ताकि धरती तर होती रहे। मनरेगा योजना से तालाबों एवं नदियों को बचाने की योजना के तहत ग्राम्य विकास विभाग वित्तीय वर्ष 2019-20 में 15000 तालाबों की खुदाई करायेगा और 11 नदियों का पुनरूद्धार करेगा। जिन नदियों के पुनरूद्धार की योजना है उनमें वरुणा, सई, टेड़ी, मनोरमा, पाण्डु, खदेड़ी, अरिल, मोरमा, मंदाकिनी जैसी नदियां शामिल हैं। पहले छोटी-छोटी नदियां हर दो-चार किलोमीटर के अंतर पर प्रवाहित होती थीं और इनमें पूरे साल जल का प्रवाह बना रहता था। इससे जल संचयन के साथ खेतों की प्यास बुझती थी, आदमी को पेयजल मिलता था और पशु-पक्षी इन नदियों के किनारे उगने वाले जंगल-झाड़ियों मे आबाद रहते थे। अगर लुप्तप्राय नदियों को फिर से विकसित किया जाता है, उनके किनारे हरियाली बढ़ायी जाती है, वृक्षारोपण किया जाता है, तो निश्चय ही यह प्रकृति के संरक्षण के साथ ही सिंचाई, पेयजल, जलसंचयन के साथ बाढ़ जैसी विभीषिका रोकने में भी मददगार होगी। दरअसल लंबे समय से संचालित मनरेगा से कोई वैल्यू क्रिएशन नहीं हो पा रहा है। ऐसे में इस योजनाओं से तालाबों का विकास होता है, नदियों का संरक्षण होता है, वृक्षारोपण किया जाता है, तो इससे पर्यावरण का संरक्षण भी होगा और योजना भी अपने वास्तविक लक्ष्य में सफल होगी।





