सरकार जब संसद के पटल पर बजट के रूप में आय-व्यय के साथ आर्थिक नीतियों का विवरण प्रस्तुत करती है तो टाइमिंग का बहुत महत्व होता है। मसलन पिछले साल जब इसी समय अंतरिम वित्तमंत्री पीयूष गोयल लेखानुदान प्रस्तुत कर रहे थे, तो चार महीने के बजट में उन्होंने इतनी योजनाएं घोषित कर डाली थीं कि शायद ही कोई बचा हो जिसको कुछ न मिला हो। पांच लाख तक जीरो टैक्स, किसानों, मजदूरों, व्यापारियों को पेंशन, किसानों को छह हजार की मदद साथ ही केन्द्र प्रायोजित विकास पर दिल खोल कर खर्च किये थे।
इस दरियादिली से विपक्ष तनाव में आ गया था क्योंकि महज दो महीने बाद उसे चुनाव में जाना था और लेखानुदान ने मोदी की वापसी की पटकथा लिख दी थी। लेखानुदान के माध्यम से वापसी की जो पृष्ठभूमि तैयार की गयी चुनाव में सब कुछ वैसा ही घटा। मोदी भारी जनादेश लेकर लौटे, लेकिन इसके साथ ही अब उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती घोषित योजनाओं को लागू करने की थी। इसमें प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना भी था जिसमें हर साल सरकार को 87 हजार करोड़ खर्च करना है। लेखानुदान में सरकार ने सेंटाक्लाज का जो रूप दिखाया उसके कारण पूरे साल अर्थव्यवस्था हिचकोचे खाती रही।
विकास योजनाओं में कटौती करनी पड़ी, सरकार के तमाम जरूरी खर्चों पर मुट्ठी कसनी पड़ी। वित्तीय अनुशासन पर चट्टान की तरह अड़ी रही मोदी सरकार को आखिर में पीछे हटना पड़ा। पिछले साल की दरियादिली का ही परिणाम है कि चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा 0.5 फीसद बढ़कर 3.8 अनुमानित है। बहरहाल 2020-21 में सरकार ने वित्तीय अनुशासन पर लौटने का वायदा किया है, लेकिन फिर भी लगभग साढ़े तीस लाख करोड़ के बजट में सभी स्रोतों से सरकारी प्राप्तियां साढ़े बाइस लाख करोड़ ही अनुमानित हैं। स्पष्ट है कि सरकारी उधारी आठ लाख करोड़ को पार कर जायेगी।
बहरहाल प्रगति को आगे बढ़ाने के लिए राजकोषीय हथियारों का सहारा लेना कोई गलत नहीं है, क्योंकि दुनिया के अनेक देश डिफिसिट फाइनेसिंग से ही आगे बढ़े हैं। चीन इसका ज्वलंत उदाहरण है। चौदह ट्रिलियन डॉलर की ऊंचाई पर पहुंचने के लिए चीन को 28 ट्रिलियन से अधिक की उधारी में डूबना पड़ा। ऋणग्रस्तता के मामले में भारत की स्थिति अपेक्षाकृत ठीक है, क्योंकि तमाम सब्सिडी, कर्जमाफी जैसी योजनाओं के बावजूद उधारी जीडीपी के आधे से भी कम है और इसे एक बेहतर राजकोषीय प्रबंधन कहा जा सकता है।
बजट में कोई लोकलुभावन योजना नहीं है इसलिए अधिकांश लोग इससे सहमत नजर नहीं आयेंगे लेकिन विकास की दृष्टि से देखें तो ऐसे ही बजट सफल होते हैं जिसमें लफ्फाजी और लोकप्रियता कम हो और विकास व सुुधार के ठोस उपाय अधिक। इस बजट यह सब है। कृषि, सिंचाई, पशुपालन पर फोकस है। एमएसएमई, निर्यात, कौशल विकास, अपे्रटिंस और सरकारी भर्तियों के सहारे रोजगार बढ़ाने की बात है। रेलवे को सुधारों की पटरी पर दौड़ाने का प्रयास है तो एलआईसी को आईपीओ के सहारे बाजार में लाकर सरकार ने आगामी कई वर्षों तक विनिवेश के सफलता की पटकथा लिख दी है।
नये टैक्स स्लैब के माध्यम से छूट न लेने वाले करदाताओं को फायदा मिलेगा, तो हाइवे, डिजिटल कनेक्टिविटी, रोड, रेल व उड़ान के माध्यम से किसानों को मुख्य आर्थिक धारा से जोड़ने का दूरदर्शी प्रयास है। इस तरह बजट से भले हेडलाइंस बढ़िया न बने लेकिन विकास तेज होगा, सड़कें तेजी से बनेंगी और रेलवे सुधार की पटरी पर दौड़ेगी।





