असोम, पं. बंगाल, केरल, पॉडिचेरी और तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ ही इन राज्यों में चुनावी नफा-नुकसान को लेकर अपने-अपने तरीके से अनुमान एवं विश्लेषण शुरू हो गये हैं। चार राज्य एवं एक केन्द्र शासित प्रदेश में प्रस्तावित चुनाव का केन्द्र सरकार की रीति-नीति पर भी बहुत असर पड़ेगा।
एक लंबे समय से जारी किसान आंदोलन पर भी इसका असर पड़ेगा और केन्द्र में भारी बहुमत के साथ साथ पौने दो साल पूर्व सत्ता में वापस करने वाली मोदी सरकार के तमाम फैसलों का लिट्मस टेस्ट भी इसी चुनावों में होना है। इन चुनावों का सीधा असर केन्द्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा क्योंकि देश की पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी सबसे बड़ी पार्टियों का भविष्य भी इससे तय होगा।
भाजपा असोम में सत्ता बचाने के लिए, बंगाल में सत्ता हथियाने के लिए तो केरल, तमिलनाडु और पॉडिचेरी में अपनी उपस्थिति को और मजबूत करने के लिए पूरे दमखम से लड़ेगी, क्योंकि इन चुनावों में अगर प्रतिकूल परिणाम सामने आये तो मोदी सरकार को और अधिक तीव्र आलोचना, और अधिक विरोध के साथ ही कोरोना से लेकर बेरोजगारी, महंगाई आदि तमाम चीजों का ठीकरा सरकार के माथे पर फोड़ा जायेगा और फिर जवाब देते नहीं बनेगा। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस का भी इन चुनावों में इम्तिहान होना है।
पॉडिचेरी में सरकार गंवा चुकी पार्टी को सत्ता में वापसी की चिंता करनी होगी तो केरल में कांग्रेस नेतृत्व वाला यूडीएफ वाम दलों के गठबंधन एलडीएफ से सत्ता छीनने का प्रयास करेगा। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल है और यहां पार्टी की कोशिश या कहें हशरत जरूर होगी कि वह बढ़े नहीं तो कम से कम वर्तमान स्थिति पर ही बरकरार रहे। असम में वह डेढ़ दशक के शासन के बाद कांग्रेस 2016 में भाजपा से मात खा गयी थी।
इस बार असोम में भी कांग्रेस की कोशिश सत्ता में वापसी की होगी। जहां तक तमिलनाडु की बात है तो यहां के चुनावी नतीजों का भाजपा पर सीधे कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा लेकिन कांग्रेस और उससे भी बढ़कर यूपीए के लिए बड़ा महत्व है, क्योंकि एक तो कांग्रेस का सबसे बड़ा सहयोगी डीएमके के रूप में तमिलनाडु विधानसभा के चुनाव में मुख्य दावेदार है और दूसरे कांग्रेस को भी लोकसभा की सबसे अधिक सीटें इसी राज्य में मिली हैं।
ऐसे में अगर तमिलनाडु में डीएमके के नेतृत्व में गठबंधन अगर बेहतर प्रदर्शन करता है तो यूपीए को निश्चित ही संजीवनी मिलेगी। पं. बंगाल चुनाव के बाद भाजपा जहां रायटर्स बिल्डिंग पर कब्जा करने के लिए आतुर है तो हर मुद्दे पर केन्द्र से टकराव लेने वाली ममता बनर्जी का पूरा राजनीतिक अस्तित्व ही दांव पर लगा है। बंगाल के चुनाव परिणामों में बड़ा उलटफेर होता है और यह भाजपा के पक्ष में रहा तो कम से कम अगले आम चुनाव तक केन्द्रीय राजनीति में विपक्ष की दावेदारी कमजोर होगी। इसलिए बंगाल के नतीजे सिर्फ टीएमसी या ममता के लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं बल्कि यूपीए, थर्ड फ्रंट और विपक्षी राजनीति का भविष्य भी इस पर टिका है।
चुनाव आयोग ने बड़ी समझदारी से राज्यों की कानून व्यवस्था के अनुसार चुनाव कार्यक्रम घोषित किये हैं। बंगाल में आठ चरणों में चुनाव है तो उतने ही बड़े तमिलनाडु में एक चरण में चुनाव होगा। दरअसल यह कानून व्यवस्था का ही नमूना है। आयोग ने 2 मार्च से चुनाव प्रक्रिया शुरू कर 2 मई को परिणाम घोषित करने का कार्यक्रम जारी किया है। इससे चुनावों का सीबीएसई की परीक्षाओं से टकरव भी नहीं होगा।





