महाराष्ट्र के पालघर में उन्मादी भीड़ ने जिस तरह पीट पीटकर दो संतों और उनके ड्राइवर को मौत के घाट उतार दिया उससे पूरे देश में आक्रोश है। पालघर में हुई मॉब लिंचिंग की घटना ने एक साथ न सिर्फ कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े किये हैं बल्कि पुलिसिया कार्यप्रणाली और उस राज्य में जहां कोरोना महामारी सबसे भयावह रूप में विद्यमान है, वहां लॉकडाउन का पालन किस तरह से हो रहा है इसकी भी पोल खुल गयी है।
बताया जा रहा है कि चोर की अफवाह में भीड़ एकत्रित हुई और पुलिस के सामने ही संतों को मौत के घाट उतार दिया। बहरहाल इस घटना की सच्चाई क्या है यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा, लेकिन जिस तरह से साम्प्रदायिक रंग देने या न देने की बहस शुरू हो गयी है उसमें यह आशंका जरूर उत्पन्न हो गयी है कि कहीं साम्प्रदायिक-गैर साम्प्रदायिक की बहस में अपराध का मामला पीछे न छूट जाये।
घटना 16 अप्रैल की है जब मुंबई से 70 वर्षीय संत महाराज कल्पवृक्षगिरी, उनके 35 वर्षीय शिष्य सुशील गिर और वाहन चालक नीलेश मुंबई से अपने निजी वाहन से सूरत जा रहे थे किसी परिचित के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए। लॉकडाउन के कारण पुलिस की रोक-टोक से बचने के लिए ग्रामीण क्षेत्र के रास्तों से जब ये लोग गुजर रहे थे तभी पालघर के गड़चिनचले गांव में दो-ढाई सौ की भीड़ ने घेर लिया और र्इंट, पत्थरों से इनकी गाड़ी पर प्रहार शुरू कर दिया।
घटना की जानकारी पर पहुंची पुलिस मूकदर्शक बनी रही है और हत्यारों ने पुलिस के सामने से खींचकर संतों की हत्या की। यहां अगर पुलिस ने अपने कर्तव्य का निर्वहन किया होता तो संतों का जीवन बचाया जा सकता था, लेकिन पुलिस ने बचाने की कोशिश करने के बजाय खुद बचकर भाग निकली। इस नृशंस हत्याकांड की जानकारी जब मीडिया के जरिये लोगों तक पहुंची तो पूरा देश विशेषकर संत समाज आक्रोश में फैल गया।
बहरहाल ऐसी घटनाएं चाहे महाराष्ट्र में हों, झारखंड में हों या कर्नाटक में, मॉब लिंचिंग एक बड़ी समस्या है और इसे रोकने के तमाम प्रयास विफल साबित हुए हैं। मॉब लिंचिंग के बाद प्राय: ऐसी कहानियां सामने आती हैं या गढ़ी जाती हैं कि चोर की अफवाह में घटना हुई या बच्चा चोरी के शक में ऐसा किया गया। लेकिन जो भीड़ हमेशा सोशल मीडिया पर रहती है, वाट्सएप, एसएमएस पर एकत्रित होकर बेगुनाह की जान ले लेती है उसे यह भी पता होता है कि हत्या सबसे बड़ा अपराध है। इसलिए चोर की अफवाह में हुई या किसी और कारण से, इस पर बहस मूर्खता है।
कानून में दोषियों के लिए दण्ड सुनिश्चित है। हत्या किसने की, क्यों की… इस पर वक्त जाया करने के बजाय पूरे घटना की निष्पक्ष जांच हो और सभी दोषियों को पकड़कर फास्ट टैÑक कोर्ट में मुकदमा चलाया जाये और सभी अपराधियों का एक वर्ष में ट्रायल करके मृत्युदंड दिया जा सके तो निश्चय ही ऐसी घटनाओं पर लगाम लगेगी।
इस घटना की सीबीआई से जांच हो और दोषियों पर मुकादमा चलाकर कम से कम फांसी की सजा दी जाये। अगर इस संदर्भ में कानून कमजोर है तो संसद कठोर कानून बनाना चाहिए ताकि इस हत्याकांड का एक भी दोषी चाहे वह बालिक हो या नाबालिग बचने न पाये। अगर ये बच गये तो समाज के लिए बड़ा खतरा बनेंगे और ऐसी घटनाओं को बढ़ावा मिलेगा।





