मनरेगा योजना को पूरे देश में लागू हुए दस साल से अधिक हो गये हैं, लेकिन इसकी खामियों को दुरुस्त नहीं किया जा सका है। मनरेगा बहुत कल्याणकारी योजना है इसलिए सरकार बदलने के बाद भी यूपीए की इस फ्लैगशिप योजना को वर्तमान सरकार भी बदस्तूर चला रही है। हालांकि मनरेगा में इतना भ्रष्टाचार है कि इसने तमाम अन्य बुराइयों को भी जन्म दिया है।
जबसे मनरेगा योजना अस्तित्व में आया और ग्राम पंचायतों को महत्वपूर्ण भूमिका मिली, तो ग्राम पंचायतों के प्रधान रातोंरात सम्पन्न हो गये। ग्राम पंचायतों के चुनाव में प्रतिस्पर्धा बहुत बढ़ गयी है। पैसे का खेल, वोटों की खरीद-फरोख्त, धनबल, बाहुबल का इस्तेमाल तो होता ही है, शराब व ड्रग्स तक मतदाताओं को पहुंचाने के खेल होते हैं। पंचायतों के चुनाव में प्रतिस्पर्धा के चलते उत्पन्न दुश्मनी वर्षों तक कायम रहती है। इस सिलसिले में गांवों में हत्या और संघर्ष की घटनाएं भी खूब होती हैं। मनरेगा के धन की लूट के लिए होने वाली इन तमाम साजिशों के बावजूद अगर वर्तमान सरकार यूपीए की इस योजना को आगे बढ़ा रही है तो इसके पीछे इसका जन कल्याणकारी होना ही है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मनरेगा योजना को यूपीए सरकार की विफलताओं का स्मारक बताया था, तो इसके पीछे इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार ही था। लेकिन एनडीए सरकार के ही ग्रामीण विकास मंत्री ने मनरेगा की तारीफ करते हुए कहा था कि देश के बहुत से गरीबों के हाथ में पांच सौ रुपये का नोट मनरेगा योजना के कारण ही आया। मनरेगा योजना ग्रामीण गरीबों एवं बेरोजगारों को साल में 100 दिन रोजगार देने की योजना है और अगर गरीबों को 100 दिन का काम मिल जाता है, तो इससे उनके हाथ में इतनी नकदी आ जाती है कि पूरे साल उनकी छोटी-छोटी अनेक जरूरतें पूरी हो जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के ठोस साधन नहीं हैं।
ऐसे में छोटे-छोटे किसान, मजदूर जब उनको अपने काम फुर्सत होती है, तो ऐसे दिनों में मनरेगा में काम कर छोटी-मोटी कमाई कर लेते हैं। लेकिन भ्रष्टाचर के कारण गरीबों की इस योजना पर बड़े-बड़े घाघ कुंडली मारकर बैठ जाते हैं। मनरेगा में काम करने के बाद महीनों तक मजदूरी नहीं मिलने, ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव की मिली भगत से बिना काम के ही फर्जी मजदूरों के खातों में पैसा ट्रॉसफर कराने और फिर उसमें कमीशन लेने की शिकायत मिलती रहती हैं।
हालांकि एनडीए की सरकार ने अब मनरेगा योजना की अनेक खामियों को दुरुस्त किया है, मनरेगा के बजट से अब सड़क, पौधरोपण, तालाबों की सफाई, पोखर का निर्माण जैसे काम कराये जाते हैं और पैसे खर्च करने के बदले संपत्तियों का सृजन या फिर विजिबल विकास को दिखाना होता है। ऐसे में अब फर्जीवाड़ा कुछ कम जरूर हुआ है, लेकिन मनरेगा श्रमिकों की मजदूरी अब भी देर से ही मिलती है। इसके पीछे कमीशन और भ्रष्टाचार की मंशा होती है। प्रदेश सरकार ने 15 दिन में मजदूरी भुगतान को अनिवार्य बना दिया है। इससे अब श्रमिकों को समय से मजदूरी मिल सकेगी और जो अधिकारी भुगतान में देरी करेंगे उनको उचित दण्ड भी मिलना तय हो गया है। यह एक अच्छा संकेत है।





