पर्यावरण शब्द को उचारते ही प्रदूषण का परिदृश्य उभरता है। निश्चय ही देश में ऐसी ही स्थिति है परंतु नि:संदेह पर्यावरण प्रदूषण का पर्याय मात्र नहीं है, दूसरे अवयव भी मौजूद हैं। साल भर हमारे पर्यावरण और परिवेश में हर दिन कुछ न कुछ उल्लेखनीय घटता रहा। कभी कुछ सुखद तो कई बार हृदय विदारक और बहुधा शोचनीय।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ पर्यावरणीय सम्मेलनों, बैठकों ने वैश्विक मंचों और संगठनों में इस साल पर्यावरण के मुद्दे पर प्रखरता का बोध हुआ। पर्यावरणीय संकेतों को देर से ही सही पर इस साल गंभीरता से समझा गया और उसके संरक्षण के प्रयासों पर भी जोर दिखा। संयुक्त राष्टÑ में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर दुनियाभर के नेताओं को हड़काने वाली महज 16 वर्षीय स्वीडिश छात्रा ग्रेटा थनबर्ग को टाइम मैगजीन ने 2019 का ‘पर्सन अफ द इयर घोषित किया। उसे इसी उम्र में नोबेल के लिये नामित किया गया।
पर्यावरणीय मुद्दों पर ज्यादातर देशों में अति सक्रियता दिखी तो प्रकृति की भी अति सक्रियता के चलते देश ने ही नहीं दुनियाभर के तमाम हिस्सों में दावानल, ज्वालामुखी, बाढ़ सूखा, अतिवृष्टि तूफान चक्रवात, आंधी और भूकंप देखे, झेले। उस बेला में जब हजारों प्रजातियों पर लुप्त होने का खतरा बढ़ रहा हो तभी तमाम नई प्रजातियों से भी परिचय हुआ। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 10 जनवरी को ‘राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम का शुभारंभ किया। उद्देश्य और लक्ष्य है वायु प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण और 2024 तक हवा में पीएम 2.5 और पीएम 10 प्रदूषकों के स्तर में 20 से 30 प्रतिशत तक कमी करना। कम क्या हुआ यह देश का हर नागरिक सांस महसूस रहा है।
इस साल कार्यक्रम बन गया है तो कभी काम भी हो ही जायेगा। गंगा और यमुना के प्रदूषण के कार्यक्रम बने हैं और काम भी तो चल ही रहा है, नतीजों की पूछना मना है। इस साल इन दोनों की समीक्षा हुई है। 11 फरवरी 2019 को एक खुशखबरी मिली कि दुनिया 20 वर्ष पहले की तुलना में अधिक हरी भरी हो गई है। नासा ने इसका श्रेय भारत को भी दिया। दो साल पहले 12 घंटों में 6.6 करोड़ पौधे लगाकर भारत ने अपना ही विश्व रिकर्ड तोड़ा था। इस साल पर्यावरण मंत्रालय ने विभिन्न राज्यों में वानिकी कार्यकलापों और वनीकरण हेतु 47,436 करोड़ की राशि जारी किया।
केन्द्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 12 फरवरी 2019 को ‘भारत-जलवायु समाधानों का नेतृत्व कर रहा है नामक प्रकाशन जारी किया। इस प्रकाशन में जलवायु परिवर्तन से निपटने और अनुकूलता के लिए विभिन्न क्षेत्रों में देश की मुख्य कार्रवाइयों का उल्लेख किया गया। बताया गया कि अंतर्राष्टÑीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन के विविध पहलुओं पर कार्य करने वाला दुनिया का एक सक्रिय देश बन गया है। यह लगा भी, भारत पहली बार इस वर्ष के मैड्रिड में जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन सूचकांक (सीसीपीआई) में शीर्ष दस देशों में शामिल हो गया।
भारत जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन सूचकांक में नौवें स्थान पर आया और यह प्रमाणित हो गया कि यह सब भारत के कार्बन उत्सर्जन से उबरने हेतु किए गए प्रयासों का ही परिणाम है। एनजीटी भी इस साल बहुत सक्रिय रहा। कई मुकदमे दायर किये, जांच किये और छापे मारे उसने सीपीसीबी को ध्वनि प्रदूषण मानचित्र तैयार करने का निर्देश दिया। वायु प्रदूषण से पूरे साल राहत नहीं मिली।
दिल्ली को अदालत ने गैस चेंबर बताया और वह संसार में सबसे प्रदूषित शहर की कुख्याति इस बार अभी पा गया। देश के अधिकांश शहरों में सिंगल यूज प्लास्टिक को प्रतिबंधित किया गया, भले उसका कोई असर न हुआ हो। संयुक्त राष्टÑ पर्यावरण सभा का चौथा सत्र इस साल केन्या के नैरोबी में संपन्न हुआ। सभी सदस्य देशों ने सहमति से 2030 तक एक बार उपयोग होने वाले प्लास्टिक उत्पादों जैसे प्लास्टिक के चाय के कप, पानी की बोतल और प्लास्टिक की थैलियां आदि का देश में उपयोग कम करने पर भी सहमति व्यक्त की। माउंट एवरेस्ट से 3,000 किलोग्राम कचरा हटाया गया। संयुक्त राष्टÑ की वैश्विक पर्यावरण आउटलुक रिपोर्ट का 6वां संस्करण जारी हुआ। इसमें कहा गया है कि वर्ष 2018 में, वायु प्रदूषण से भारत में 1.24 मिलियन लोगों की मृत्यु हुई जो कि सभी मौतों का लगभग 12.5 प्रतिशत है।





