पाश्चात्य दार्शनिक लॉर्ड एडिंगटन ने सत्ता की मनमानी को रेखांकित करते हुए कहा है कि, सत्ता भ्रष्ट करती है और संपूर्ण सत्ता संपूर्ण भ्रष्ट करती है। सत्ता के इस चरित्र के कारण ही आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सरकार पर नियंत्रण के लिए अनेक उपाय किये जाते हैं ताकि नागरिक अधिकारों को सत्ता की निरंकुशता से बचाया जा सके।
इस संदर्भ में उत्तर प्रदेश सरकार ने विशेष सुरक्षा बल गठित करने का जो फैसला किया है उसको लेकर विपक्ष की आपत्तियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। वैसे सरकार का प्रथम दायित्व नागरिकों की रक्षा करना है और अगर इसके लिए प्रदेश सरकार ‘उत्तर प्रदेश विशेष सुरक्षा बल’ का गठन करना चाहती है तो यह उसका अधिकार है और राज्य के नागरिकों की सुरक्षा के हित में ऐसा करना भी चाहिए।
प्रदेश सरकार ने विशेष सुरक्षा बल के गठन के लिए ‘उत्तर प्रदेश विशेष सुरक्षा बल अधिनियम’ लागू भी कर दिया है और जल्द ही प्रदेश में पुलिस, पीएसी, सीआईडी जैसी संस्थाओं की ही तरह एक विशेष सुरक्षा बल भी होगा जिसका दायित्व प्रशासनिक कार्यालयों, उच्च न्यायालय, मेट्रो, बैंक जैसे संस्थानों की सुरक्षा करना होगा। विशेष सुरक्षा बल में लगभग दस हजार के करीब कर्मी होंगे और शुरुआत में इसकी पांच बटालियन बनायी जायेगी। इस पर करीब दो हजार करोड़ का बजट भी खर्च होगा।
आर्थिक संकट के इस दौर में इस समय दो हजार करोड़ रुपये विशेष सुरक्षा बल पर खर्च करना कितना उपयुक्त है यह अपने आप में एक सवाल है, क्योंकि कोरोना के कारण जो आर्थिक मंदी आयी है उससे राज्य एवं केन्द्र दोनों का राजस्व बहुत घट गया है। राजस्व में कमी के कारण ही राज्यों को ऋण अधिक लेने के साथ पेट्रोल, आबकारी आदि मदों पर बहुत अधिक टैक्स देना पड़ा रहा है।
विशेष सुरक्षा बल सरकारी प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के साथ निजी प्रतिष्ठानों को भी सुरक्षा उपलब्ध करा सकता है, लेकिन इसके लिए निजी प्रतिष्ठानों को भुगतान करना पड़ेगा। भारत सरकार के अधीन इसी तरह का एक संगठन केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल सीआईएसएफ है जो सरकारी प्रतिष्ठानों की रक्षा करती है। ऐसे में अगर उत्तर प्रदेश सरकार महत्वपूर्ण संस्थानों की सुरक्षा के लिए विशेष सुरक्षा बल गठित कर रही है तो सुरक्षा के प्रति उसकी यह चिंता उचित है।
लेकिन विशेष सुरक्षा बल को बिना किसी वारंट के गिरफ्तारी, छापेमारी और तलाशी लेने का जो अधिकार देने का प्रस्ताव है उस पर विपक्ष को और तमाम बुद्धिजीवियों को भी आपत्ति हो सकती है। क्योंकि उत्तर प्रदेश में पुलिस को खुली छूट देने का क्या परिणाम हुआ यह पूरा प्रदेश जानता है। हाल ही में महोबा में एक व्यापारी की हत्या पुलिसिया वसूली के सिलसिले कर दी गयी। कई पुलिस अफसरों को भ्रष्टाचार एवं वसूली के आरोप में हटाया जा चुका है।
उत्तर प्रदेश पुलिस की इस कार्य प्रणाली को देखते हुए यह जरूरी है कि किसी संस्था को अधिकार देते समय उस पर कानून, अदालत और लोकतांत्रिक संस्थानों का वाजिब नियंत्रण रखा जाये अन्यथा मनमानी या अधिकारों के दुरुपयोग की गुंजाइश बनी रहेगी। सरकार महत्वपूर्ण दफ्तरों एवं प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए स्पेशल फोर्स गठित कर रही है तो यह भी ध्यान रखना चाहिए यह वास्तव में स्पेशल हो। इनकी भर्ती, टेÑनिंग, कार्यप्रणाली सब कुछ खास हो। ऐसा न हो कि यह भी सामान्य पुलिस की तरह एक अलग संगठन बन कर रह जाये।





