रायसीना डायलॉग का 14-16 जनवरी के बीच आयोजन हुआ जिसमें 100 देशों के 700 प्रतिनिधियों ने भागीदारी की। स्वतंत्र थिंक टैंक आब्जर्वर फाउंडेशन इसे विदेश मंत्रालय के साथ मिलकर आयोजित करता है। बीते चार साल से नियमित आयोजित हो रहे इस वैश्विक कूटनीतिक विमर्श को अब पहचान मिल चुकी है और शायद आगामी वर्षों में बुद्धिजीवियों, शोधार्थियों और जागरूक नागरिकों को इस आयोजन का इंतजार रहेगा।
वैश्विक कूटनीतिक विमर्श का पर्याय बन चुका रायसीना डायलॉग कितना सफल रहा, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें 7 पूर्व राष्ट्राध्यक्ष, 12 विदेश मंत्री सहित 100 देशों के 700 प्रतिनिधि शामिल हुए। इस वर्ष रायसीना डायलॉग का विषय था-एजेंडा 2030, आधुनिक दुनिया में प्रौद्योगिकी की भूमिका, जलवायु परिवर्तन और काउंटर टेरेरिज्म। ये सभी वैश्विक मुद्दे एवं चुनौतियां हैं जिन पर दुनियाभर की सहमति और साझा प्रयास जरूरी है। गरीबी की चुनौतियों से उबरने में प्रौद्योगिकी की महत्वपूर्ण भूमिका है, तो जलवायु परिवर्तन और आतंकवाद मानव अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बना हुआ है।
यह बात भी गौरतलब है कि ये सभी सवाल इतने बड़े हैं कि इनका हल कोई एक देश नहीं खोज सकता है बल्कि वैश्विक सहमति और साझा प्रयास से ही इनके प्रभावी समाधान हो सकते हैं। इस वर्ष जब यह डायलॉग आयोजित हुआ तो इसमें इन महत्वपूर्ण मुद्दों के अतिरिक्त एक बड़ी बात यह रही कि भारतीय प्रतिनिधियों ने स्पष्ट रूप से यह संकेत दिया कि भारत अब अतीत के बंधनों से निकल कर आधुनिक दुनिया में महत्वपूर्ण भूमिका पाना चाहता है। दरअसल रायसीना डायलॉग में आये प्रतिनिधियों ने स्पष्ट रूप से भारत से आग्रह किया कि भारत को अपने दायरे से बाहर निकलकर वैश्विक कूटनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए।
हाल के वर्षों में दुनिया में जो आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन और क्षेत्रीय टकराव जैसी चुनौतियां उभर कर सामने आयीं हैं, उसमें भारत जैसे शांतिप्रिय, विश्वसनीय और लोकतांत्रिक देश की भूमिका बहुत बड़ी है। यह भारत के लिए गौरव की बात है कि जब दुनिया में तीसरे विश्व युद्ध की अटकलें चल रही हों, अमरीका और ईरान आमने-सामने खड़े हों, तब इनमें से एक पक्ष बार-बार यह बात दोहराये कि भारत को आगे आकर तनाव को दूर करने व युद्ध की आशंकाएं खत्म करने की दिशा में सार्थक पहल करनी चाहिए। दरअसल वैश्विक मंच पर भारत को अपने सामर्थ्य के अनुरूप हैसियत हासिल करनी है तो इसके लिए उसे सक्रिय पहल करनी होगी। किसी दूसरे के पचड़े से एकदम दूर रहने की नीति एक हद तक ही ठीक है।
फिलहाल भारत वैश्विक फलक पर तेजी से उभर रहा है। अगले दो दशक में भारत दुनिया का सबसे बड़ा देश, सबसे बड़ा लोकतंत्र, तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के साथ ही दो-तीन बड़ी सैन्य ताकतों में शुमार होगा। ऐसे में भारत को वैश्विक मंच पर हैसियत भी चाहिए, सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता भी चाहिए, महाशक्ति का दर्जा भी चाहिए और आतंकवाद से मुक्ति भी चाहिए। इसके लिए रायसीना डायलॉग जैसी पहल भविष्य में बहुत कारगर साबित हो सकती है।





