गणतंत्र दिवस पर राजधानी दिल्ली में ट्रैक्टर तांडव, ऐतिहासिक विरासत लालकिला में तोड़फोड़ और हिंंसक प्रदर्शन जिसमें करीब चार सौ पुलिसकर्मियों के घायल होने के बाद भी जिस तरह दिल्ली पुलिस और सरकार ने संयम दिखाया उसकी आलोचना हो रही थी कि सरकार को इतना अधिक नहीं झुकना चाहिए। किसान संगठन खुद रक्षात्मक और दबाव की मुद्रा में आ गये थे। इसके बाद कोई भी यह उम्मीद नहीं कर रहा था कि सरकार एक बार फिर आंदोलनकारी किसान संगठनों के साथ बैठक करेगी और इनसे किसी भी तरह का संवाद करेगी।
वैसे भी गणतंत्र दिवस की हिंसा के बाद आम जनता और किसान भी इन संगठनों से खफा हैं और यही कारण है कि सरकार को धरना स्थल की सुरक्षा करनी पड़ रही है क्योंकि आसपास के लोग इन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हैं और इनको भगाने के लिए एकजुट हो रहे हैं। गणतंत्र दिवस की हिंसा के बाद जरूरत से ज्यादा नरमी दिखाने पर सरकार की भी आलोचना हुई। लोग सरकार से सख्ती करने की मांग कर रहे हैं।
इसके बावजूद अगर प्रधानमंत्री ने एक बार फिर लचीला रुख अपनाकर किसानों से वार्ता की बात कही है तो इस मौके का लाभ उठाकर किसान संगठनों को बातचीत कर इस मामले को ईमानदारी से हल करना चाहिए। अगर कोई किसान संगठन या ऐसे ही किसी संगठन का कोई नेता इस सरकार को झुकाने या संसद को नीचा दिखाने का घमंड या भ्रम पाले है तो उसे यह सब छोड़ देना चाहिए क्योंकि देश के किसी भी किसान संगठन, या उसके नेता से हजार गुणा ज्यादा लोकप्रिय और ताकतवर सरकार है। इस सरकार को 138 करोड़ देशवासियों ने भारी बहुमत के साथ चुना है देश चलाने के लिए।
इसलिए किसान संगठन किसानों के हित की बात करें, उनकी समस्याएं उठायें लेकिन ऐसी हरकत या एटीट्यूट न दिखायें कि देश के सारे किसान प्रदर्शन करने वाले किसान संगठनों के साथ खड़े हैं। देश में हजारों किसान संगठन हैं और सभी किसान के हित में काम करते हैं ऐसा कदापि नहीं है। वैसे भी इस सरकार को भी किसानों ने ही चुना है इसलिए सरकार भी किसानों का हित चाहती है। अब अगर किसान संगठन भी किसानो का हित चाहते हैं तो सरकार के साथ सार्थक संवाद करें।
सरकार तीनों कृषि कानूनों को स्थगित करने, किसान हित में सभी जरूरी सुधार करने को तैयार है। ऐसे में समस्या कहां है यह बात किसी के समझ में नहीं आ रहा है। जहां तक तीनों कृषि कानूनों को रद करने की बात है तो यह देश हित से जुड़े है और देश की आधी से अधिक आबादी जो सबसे ज्यादा संकटग्रस्त है उस किसान समुदाय के व्यापक हित में बनाया गया है।
इसलिए दो-चार किसान संगठन या दो-चार लाख प्रदर्शनकारियों के सामने आत्मसमर्पण कर कानूनों को रद करना देश के अस्सी करोड़ से अधिक किसानों के साथ धोखा करने जैसा होगा। इसलिए किसी भी सूरत में को कानून रद नहीं करना चाहिए बल्कि कुछ माह के लिए स्थगित कर इसकी कमियां दूर करने और किसान हित के लिए और अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास होना चाहिए। यही देश एवं किसानों के हित में होगा।





