इसमें कोई दो राय नहीं है कि भूटान और भारत के रिश्ते वैश्विक कूटनीति से ऊपर के हैं। हाल फिलहाल में या कभी अतीत में भूटान ने इस संबंध में कोई संकट भी नहीं खड़ा किया। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चीन और नेपाल भी भूटान पर नजर रखे हुए हैं। ये दोनों देश हमेशा इस फिराक में रहते हैं कि कब हिंदुस्तान-भूटान के किसी समीकरण में जरा सा झोल पैदा हो और ये दोनों उसे अपने पाले में मिला लें। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी की दो दिवसीय सफल भूटान यात्रा महत्वपूर्ण है।
सेंट्रल भूटान के ट्रोंग्सा जिले (जोंखा) में बहने वाली मांगदेच्चू नदी की तेज धारा अब 720 मेगावाट क्षमता वाली बिजली पैदा करने लगी है। इसका अनावरण प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी भूटान यात्रा में सबसे पहले किया। मांगदेच्चू जल विद्युत परियोजना पर 4500 करोड़ का खर्च आया है, जिसमें भारत का सहयोग है। इसे मिलाकर भूटान लगभग दो हजार मेगावाट पनबिजली पैदा करने लगा है। भूटान की घरेलू बिजली जरू रतें 20 फीसद से अधिक नहीं है। बाकी जल विद्युत उसे बेचनी होती है। एक आंकलन के अनुसार, भूटान 26 हजार 760 मेगावाट तक पनबिजली पैदा कर सकता है। पीएम मोदी की दूसरी बार भूटान यात्रा में जो दस समझौते किये गये, उसमें जल विद्युत का विपणन सबसे महत्वपूर्ण है।
पीएम मोदी ने अपनी यात्रा से पहले दिये बयान में स्पष्ट कर दिया था कि भारत-भूटान का सहकार एक विशेष गुण और सारतत्व के साथ आगे बढ़ रहा है। हमें जल ऊर्जा में सहयोग करना है और व्यापार के क्षेत्र में आगे बढ़ना है। पिछले साल हमने उभयपक्षीय संबंधों के पचास वर्ष पूरे होने पर उसकी स्वर्ण जयंती मनायी थी। दिसंबर 2018 में भारत ने भूटान की 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए पांच हजार करोड़ देना मंजूर किया था। उससे पहले 11वीं पंचवर्षीय योजना के वास्ते भारत, भूटान को 4500 करोड़ दे चुका है।
जल विद्युत के क्षेत्र में पीएम मोदी भूटान को महत्वाकांक्षी बनाना चाहते हैं, उनकी इस यात्रा से स्पष्ट हुआ है। भारत-भूटान के बीच दस समझौतों पर हस्ताक्षर किये गये। इनमें स्पेस रिसर्च, हवाई सुरक्षा, सूचना तकनीक, जल विद्युत विपणन, अकादमिक समझौतों को शामिल कर पीएम मोदी ने संदेश देना चाहा है कि भारत अपने पड़ोसी की समृद्घि चाहता है। इस समय कूटनीति के केंद्र में 51 साल के भूटानी प्रधानमंत्री डॉ. लोटे छिरिंग हैं, जिन्हें देश का भविष्य तय करना है और अपने चुनावी वायदे को भी पूरा करना है। पेशे से यूरोलॉजिस्ट डॉ. लोटे छिरिंग के कॅरियर का बड़ा हिस्सा बांग्लादेश और ऑस्ट्रेलिया में गुजरा है। चुनाव के समय देश में सबको स्वास्थ्य का नारा डॉ. लोटे छिरिंग की पार्टी ड्रूक न्यामरू प त्शोंगपा (डीएनटी) ने दिया था।
भूटान में स्वास्थ्य सेवा की खस्ताहाली से नाराज वोटर बदलाव चाहते थे, यह बात 2017 के आखिर में स्पष्ट हो गई थी। भारत ने भूटान में स्वास्थ्य के क्षेत्र में सहयोग देने का वादा भी किया था। डॉ. लोटे छिरिंग के सत्ता में आने के बाद से स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार हुआ है, यह स्पष्ट रू प से दिखने लगा है। इस समय शहरी भूटान में प्रत्येक 10 हजार की आबादी पर पांच डॉक्टर और 12 नर्सें उपलब हैं। डॉ. लोटे इसका विस्तार गांवों तक करना चाहते हैं। भारत में 11 हजार 85 लोगों की आबादी पर एक एलोपैथिक डॉक्टर उपलब्ध है, इससे भूटान में स्वास्थ्य सुविधाओं की हम तुलना कर सकते हैं। सबसे दिलचस्प यह है कि वहां एक भी प्राइवेट क्लिनिक नहीं है। बाहर से आये पर्यटक भी सरकारी अस्पतालों में इलाज करा सकते हैं।
भूटान में आधिकारिक रूप से पांच पार्टियां रजिस्टर्ड हैं। ड्रूक न्यामरूप त्शोंगपा (डीएनटी) जो पीएम डॉ. लोटे छिरिंग की पार्टी है। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी), ड्रूक फेंन्सुम त्शोंगपा (डीपीटी), भूटान क्वेन न्याम पार्टी (बीकेपी) और ड्रूक छिरवांग त्शोंगपा (डीसीटी)। इन पांचों में से सबसे पहले पीडीपी को सत्ता में आने का अवसर मिला था। पांच साल की अवधि में पीडीपी आर्थिक मोर्चे पर विफल रही थी। भूटान का जीडीपी दो प्रतिशत रहने की वजह से आम जनता उस सरकार से दुखी थी। 2013 के दूसरे आम चुनाव में ड्रूक फेंन्सुम त्शोंगपा (डीपीटी) को सत्ता में आने का अवसर मिला। उस चुनाव में ड्रूक न्यामरूप त्शोंगपा (डीएनटी) तीसरे नंबर पर आने की वजह से फाइनल राउंड से बाहर हो गई थी।
डीएनटी, उस समय सोशल डेमोक्रेटिक विचारधारा वाली नई-नवेली पार्टी थी। 20 जनवरी 2013 को इसका रजिस्टेशन हुआ था और चुनाव था 31 मई व 13 जुलाई 2013 को। पांच साल की अवधि में यदि भूटान में सेंटर लेफ्ट पार्टी का विस्तार हुआ है, तो क्या उसके पीछे नेपाल के वामपंथियों को भी लगाया गया था? इसका उत्तर ढूंढने की आवश्यकता है। इसे ध्यान में रखना होगा कि भूटान में अब भी 20 फीसदी आबादी वैसे लोगों की है, जो नेपाली मूल के हैं और उनकी भाषा नेपाली है। 1988-89 के बीच कोई डेढ़ लाख नेपाली मूल के लोग भूटान से निकाले गये। उनकी वापसी का मुद्दा दो दशकों से दफन है। मगर इस अवधि में वहां बचे खुचे लोगों की नई पीढ़ी एक बार फिर 20 प्रतिशत पर आ गई है।
इनमें अधिकतर वो लोग हैं, जिनका बेटी-रोटी का रिश्ता नेपाल से बना हुआ है। इसके बजरिये सेंटर लेफ्ट विचारधारा का निर्यात नेपाल से हुआ है, इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता। एक कहावत है, ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना।‘ उस समय पाकिस्तान इस बात से प्रसन्न हुआ था कि चीन, जिस पार्टी को भूटान की सत्ता में देखना चाहता था, उसकी जीत हुई है। चीन और भूटान के बीच कूटनीतिक संबंध नहीं हैं, फिर भी इस तथ्य को ध्यान में रखना आवश्यक है कि जनवरी से अक्टूबर 2018 के बीच नई दिल्ली से चीनी दूतावास के डिप्लोमेट पांच बार थिंपू की यात्रा कर चुके हैं। भूटान को नेपाल कई बार अपने आइने में उतारने का प्रयास कर चुका है, उसकी वजह जल ऊर्जा है, जो नेपाल की सबसे बड़ी जरूरत है। नेपाल के साथ खतरा यह है कि वन बेल्ट वन रोड के चीनी क्लब का सदस्य हो चुका है। थिंपू से उसकी नजदीकियां कहीं न कहीं चीन के एजेंडे को आगे बढ़ाएंगी।





