गत वर्ष अगस्त महीने से प्याज के दाम चढ़ने लगे थे और सितम्बर तक 50-60 रुपये किलो तक पहुंच गये थे। जब कीमतें अचानक बढ़ने लगीं तो सरकार ने प्याज निर्यात पर रोक लगा दी, स्टॉक लिमिट लागू कर दी और ईरान व अफगानिस्तान से प्याज का आयात किया।
सरकार के इन कदमों से महज दो सप्ताह में प्याज के दाम गिरने लगे और स्थिति यह हो गयी कि आयातित प्याज को किसी राज्य ने उठाया ही नहीं जिसके कारण वह खराब हो गया। केन्द्र सरकार ने पिछले महीने ही कृषि सुधारों को आगे बढ़ाते हुए तीन महत्वपूर्ण कानून पास किया है जिसके जरिये कृषि बाजार में क्रांतिकारी सुधार का दावा किया जा रहा है। इन तीन कानूनों में एक है आवश्यक वस्तु अधिनियम-1955 में संशोधन भी है।
आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन कर सरकार ने आलू, प्याज, खाद्य तेल, दाल, तिलहन जैसे उत्पादों पर भंडारण की सीमा हटा ली है। सरकार का तर्क है कि इससे कोल्ड स्टोरेज, भंडारण और इससे ज ुड़ी लॉजिस्टिक ढांचे का विकास होगा जिससे रोजगार बढ़ने के साथ ही किसानों को उचित मूल्य भी मिलेगा।
अभी तक किसी औद्योगिक समूह ने इस तरह के निवेश की बात नहीं कही है लेकिन जमाखोरों ने आलू और प्याज के स्टॉक को जमा करके इनके दाम को आसमान पर पहुंचा दिया है। संशोधित आवश्यक वस्तु अधिनियम कानून में यह प्रावधान है कि बाढ़, सूखा या राष्ट्रीय आपदा की स्थिति में स्टॉक लिमिट लगायी जा सकती है या फिर कृषि जिंसों के दाम अगर सौ फीसद से अधिक बढ़ जाते हैं तब स्टॉक लिमिट लागू की जा सकती है।
इसी प्रावधान के तहत प्याज की बढ़ती कीमतों के मद्देनजर सरकार ने बीते शुक्रवार को स्टॉक लिमिट लागू करते हुए स्टॉकिस्ट के लिए अधिकतम भंडारण सीमा 25 टन और फुटकर विके्रता के लिए अधिकतम दो टन भंडारण सीमा तय कर दी है। स्टॉक लिमिट लागू होते ही एशिया की सबसे बड़ी प्याज मंडी लासलगांव से लेकर दिल्ली, मुंबई जैसी प्रमुख मंडियों में प्याज की कीमतें गिरनी शुरू हो गयीं। स्टॉक लिमिट लागू होने के महज दो-तीन दिन में इतनी बड़ी गिरावट से स्पष्ट है कि बड़े पैमाने पर प्याज की जमाखोरी हो रही थी। इसी तरह आलू की कीमतें 40 रुपये तक पहुंच गयी हैं।
नवरात्र के दिनों में आलू की खपत अधिक होती है। जमाखोरों ने जिस तरह से आपूर्ति कम करके नवरात्र के व्रतियों को भूख रखने का अपराध किया है उसका दण्ड भी उनको निश्चित मिलेगा। क्योंकि देश और प्रदेश में आलू की कोई कमी नहीं है। आलू की नयी फसल आने में महज चार-पांच सप्ताह बचा है और पुराना स्टॉक इतना अधिक जमा है कि बाजार में पर्याप्त आपूर्ति होने के बाद भी इसे एक-दो माह में खपाना कठिन होगा।
ऐसे में पुराने आलू की कीमतें बुआई खत्म होने के बाद तेजी से गिरेंगी और इनको बाजार में खरीदने वाला भी कोई नहीं होगा, क्योंकि नयी फसल आने के बाद अधिकांश उपभोक्ता नया आलू खरीदते हैं। बहरहाल जिस तरह से जमोखोरों एवं बिचौलियों ने साठगांठ कर बाजार में आपूर्ति सीमित कर कृत्रिम रूप से दाम बढ़ाने की साजिशें रची हैं उससे स्पष्ट है कि सरकार को कृषि बाजार में पर्याप्त दखल बनाये रखना होगा अन्यथा जमाखोर किसानों और उपभोक्ताओं, दोनों को रुलायेंगे।





