उत्तर प्रदेश में कानून के राज और पुलिस की कार्यप्रणाली पर पक्ष-विपक्ष के बीच जारी गर्मागर्म बहस एवं आरोप-प्रत्यारोप के बीच देश में ऐसी ऐतिहासिक घटना घटी जिसका सकारात्मक असर भारत के विकास, निवेश, रोजगार और पर्यावरण संरक्षण पर निश्चित रूप से पड़ेगा।
एशिया के सबसे बड़े सोलर प्रोजेक्ट रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर पवार प्लांट (रम्स) के रिकार्ड समय में पूरा होने और प्रधानमंत्री के द्वारा इसे राष्ट्र को समर्पित करने के साथ सौर ऊर्जा के क्षेत्र में विकास एवं निवेश की अपार संभावनाओं के द्वार भी खुल गये हैं। 750 मेगावाट के इस सोलर पावर प्लांट को भारत सरकार ने 2014 में स्थापित करने की मंशा जाहिर की थी और 2017 में इसकी नीलामी प्रक्रिया शुरू हुई।
पावर प्रोजेक्ट वर्षों तक लटकते, भटकते रहते हैं और कई बार तो काम शुरू होने से पहले ही परियोजना बंद हो जाती है। ऐसे माहौल में कम समय में एशिया के सबसे बड़े सोलर पावर प्रोजेक्ट का आपरेशनल मोड में आना न सिर्फ यह दर्शाता है कि अगर इच्छा शक्ति हो तो रिकार्ड समय में विकास परियोजनाओं को पूरा किया जा सकता है बल्कि इतने बड़े सोलर प्रोजेक्ट के शुरू होने से पूरी दुनिया की ऊर्जा कंपनियां भारत में निवेश के लिए उत्सुक होंगी।
अगर हम इस परियोजना के लाभों की बात करें तो अगले 25 वर्षों तक 2.97 रुपये प्रति यूनिट बिजली मध्य प्रदेश ऊर्जा विकास निगम और दिल्ली मेट्रो को मिलेगी। सबसे खास बात तो यह है कि इस परियोजना की लागत थर्मल प्रोजेक्ट से भी कम आयी है और प्रति वर्ष 15.7 लाख टन कॉर्बन डाईऑक्साइड जैसे खतरनाक गैस के उत्सर्जन को भी इससे रोका जा सकेगा। 4305 करोड़ की लागत से विकसित इस प्रोजेक्ट से न सिर्फ स्वच्छ ऊर्जा अगले 25 वर्षों तक निर्बाध रूप से मिलेगी बल्कि इस अवधि में मध्य प्रदेश सरकार को करीब 1600 करोड़ और दिल्ली मेट्रो रेल कार्पोरेशन को 800 करोड़ की बचत भी होगी।
लेकिन इससे भी अहम बात यह है कि इस प्रोजेक्ट के शुरू होने के साथ देश में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में 500 से 700 अरब डॉलर के निवेश की संवभावनाएं भी खुली हैं। आगामी वर्षों में बड़े पैमाने पर इस क्षेत्र में निवेश देखने को मिलेगा। स्वच्छ एवं रिन्यूबल एनर्जी आज की सबसे बड़ी जरूरत है और अगर इस क्षेत्र में संभावनाओं के अनुकूल विकास होता है तो न सिर्फ आयात से निर्भरता घटेगी बल्कि स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ने से पर्यावरणीय चुनौतियां भी कम होंगी।
रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर पावर प्लांट के उद्घाटन के साथ सौर ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भता बढ़ाने और आयात कम करने का सवाल भी बहुत ज्वलंत रूप से हमारे सामने खड़ा हो गया है। दरअसल बीते पांच-छह सालों में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में जो क्रांति देखने को मिली इससे सौर ऊर्जा इतनी सस्ती हो गयी कि आम लोग भी इसका लाभ उठाने लगे। सोलर प्रोजेक्ट के अधिकांश इन्पुट्स चीन से आयात किये जाते हैं।
फोटोवोल्टेक, बैटरी एवं अन्य इक्विपमेंट जो चीन से आते हैं वे सस्ते पड़ते हैं और इस कारण पूरे प्रोजेक्ट की लागत कम आती है। लागत घटने के कारण सौर ऊर्जा की व्यवहारिकता बढ़ी जिसके कारण इसका तेज विकास हुआ। लेकिन अब जबकि चीन से आयात नियंत्रित करने का प्रयास किया जा रहा है तो देश के उद्यमियों, कंपनियों एवं इंजीनियरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि देश में ही सस्ते सोलर इक्विपमेंट का उत्पादन हो।





