देश की राजनीति और सार्वजनिक संवाद में महंगाई हमेशा एक मुद्दा रहती है और इसके लिए सबसे बड़ा विलेन हमारी सरकार नहीं बल्कि तेल निर्यातक देशों का संगठन (ओपेक) रहा है। जब तेल की कीमतें नीेचे या वाजिब स्तर पर आती हैं तो ओपेक के देश संगठित होकर उत्पादन में कटौती करके आपूर्ति बाधित करते हैं जिससे दाम फिर बढ़ने लगते हैं।
यही कारण है कि नब्बे के दशक के मध्य में जो क्रूड प्राइस 10-15 डॉलर के बीच रहती थी वह धीरे-धीरे बढ़ते हुए एक समय तो 140 डॉलर तक पहुंच गयी थी। तब भी कुछ ओपेक देशों का कलेजा ठण्डा नहीं हुआ था और वे इस तिकड़म में लगे हुए थे कि जैसे-तैसे कीमतों को 200 के पार पहुंचाया जाये। हालांकि अमरीकी वैज्ञानिकों की अगुवाई में शेल गैस के विकास के बाद ओपेक देशों पर एक मनोवैज्ञानिक नियंत्रण यह लगा था कि अगर क्रूड के दाम 70-80 डॉलर से ऊपर हो जाते हैं तो शेल गैस का उत्पादन मुनाफे में जाता है और क्रूड का एक विकल्प उभरने लगता है।
शेल गैस के विकल्प आने के बाद ओपेक क्रूड प्राइस में कुछ संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। जब क्रूड 80-90 डॉलर प्रति बैरल पहुंच जाता है तो वह इसे नीचे लाने का प्रयास करता है और जब 60 डॉलर के नीचे जाने लगता है तो उत्पादन में कटौती करके कीमतें बढ़ाने में जुट जाता है। लेकिन इस बार स्थिति थोड़ा भिन्न है। ओपेक देशों में भारी मतभेद है और तेल बाजार पर गैर-ओपेक देशों की पकड़ बनाने की महत्वाकांक्षा ने तेल कीमतों को नीचे या कहें वाजिब स्तर पर ला दिया है और यह स्थिति भारत के लिए एक अवसर की है।
सऊदी अरब द्वारा उत्पादन बढ़ाने और तेल कीमतों में कटौती की घोषणा के बाद क्रूड मार्केट में हाहाकार है। प्राइस वार जैसी स्थिति बन गयी है, लेकिन यह भारत के लिए बेहतरीन मौका है। सस्ता तेल देश को आर्थिक मंदी से उबारने, महंगाई रोकने, राजकोषीय घाटे को दुरुस्त करने, आधे ट्रिलियन के करीब पहुंच चुके फॉरेक्स को एक ट्रिलियन तक पहुंचाने का स्वर्णिम मौका है। कोरोना के वैश्विक संकट बनने के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत के लिए मौके बने हैं। चीन और उसका वुहान शहर दुनिया की फैक्ट्री और ट्रॉसपोर्ट सिटी कही जाती है। कोरोना ने यही सबसे ज्यादा कहर बरपाया है।
इसी तरह जापान, उत्तर कोरिया और योरप जैसे देश भी कोरोना से संकटग्रस्त हैं। दुनिया के तमाम देशों के बीच व्यापार की बात तो दूर आवाजाही तक ठप हो गयी है। इन स्थितियों के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत के लिए बड़े अवसर बने हैं। एक फरवरी को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन ने जो बजट प्रस्तुत किया उसमें निर्यात एवं एसेम्बलिंग बिजनेस पर विशेष फोकस किया गया है।
अब वक्त है कि सरकार इस प्रोग्राम को तेजी से आगे बढ़ाये और भारत में नेटवर्क एक्सपोर्ट और एसेम्बलिंग जैसे व्यवसायों के लिए ट्रेनिंग, कंसलटेंसी, आधारभूत ढांचा, विशेष आर्थिक क्षेत्र और वित्तीय सुविधाएं मुहैया कराकर वैश्विक निर्यात में भारत के वाजिब हिस्से को हासिल करे। इससे प्रगति तेज होगी, रोजगार के मौके बनेंगे और पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने की तरफ भारत के कदम और तेजी से आगे बढ़ेंगें।





