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सामाजिक विषमता

दैनिक जीवन में हम जिन विषमताओं से होकर गुजरते हैं। जिन कठिनाइयों का हमे सामना करना पड़ता है, वे कहीं न कहीं हमारे मस्तिष्क की उपज होती हैं। इनका समाधान लक्ष्यपूर्वक साधना से ही प्राप्त हो सकता है। साधना कोई भी हो, चाहे वह कठिन हो या सामान्य, सबका उद्देश्य व्यक्तित्व का परिष्कार कर आत्मनिर्माण करना है।

हमारे समाज और जीवन में जो तमाम समस्याएं उत्पन्न होती हैं, समाज में जो उलझन और विषमता देखने को मिलती है उकसे मूल में हमारे मस्तिष्क की आंतरिक स्थिति होती है। जीवन की सारी समस्याओं का उलझना-सुलझना बहुत कुछ मनुष्य की आंतरिक स्थिति निर्भर रहता है। यों कभी-कभी कठिन प्रारब्ध भोग भी मार्ग में विघ्न बाधा बनकर अड़ जाते हैं और हटते-हटते बहुत परेशान कर लेते हैं, पर आमतौर से जीवन की गतिविधि व्यक्ति की अपनी निजी मनोभूमि पर आधारित रहती है।

जिसे क्रोध आता है उसे सब कोई अपने प्रतिपक्षी, दुष्ट और झगडालू दीखते हैं। जिसके मन में ईर्ष्या और द्वैष की प्रबलता है, उसे सर्वत्र शत्रु और दुष्ट ही दिखाई पड़ते हैं। आलसी को सब कार्य कठिन और सफलता के मार्ग में चारों आरे भारी विघ्न उपस्थित लगते हैं। विषय विकारों से जिसकी दृष्टि दूषित हो रही है, उसे हर कोई व्यभिचारी लगता है। जिनकी प्रकृति अविश्वासी और छिद्रान्वेषी बन गयी है उन्हें हर कोई संदिग्ध धूर्त और दोषी प्रतीत होता है।

डरपोक को चारों ओर से अपने ऊपर आपत्तियां मंडराती लगती रहती हैं। पतित दृष्टिकोण के लोगों को इस संसार में केवल पाप, पतन, छल, शोषण आदि दुष्ट प्रवृत्तियों का बोलबाला दृष्टिकोचर होता है। माना कि सांसर में अनेक बुराइयां मौजूद हैं और उनकी मात्रा भी बहुत है पर इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि यहां बुराई के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। निश्चित रूप से इस धरती पर बुराई की अपेक्षा भलाई कहींअधिक है।

पाप की अपेक्षा पुण्य की मात्रा ज्यादा है, कठिनाइयों से सुविधाएं अधिक है, दृष्टता से सज्जनता बढ़ चढ़ी है। यदि ऐसा न होता यह दुनिया इस योग्य न रहती कि परमात्मा का पुत्र आत्मा यहां अवतार लेता और मृत्यु की अपेक्षा जीवन को अधिक प्यार करता। प्याज खा लेने पर मुंह से बदबू आती है। नशा पी लेने पर पागलपन छा जाता है।

सनाय खा लेने पर दस्त होने लगते हैं। विषपान करने वाले सामने मृत्यु की विभीषिका उपस्थित हो जाती है। इसी प्रकार जितनी मनोभूमि असंस्कृत, पतनोन्मुख, निम्नस्तर की एवं उलझन भरी है। उनका वाह्या जीवन निश्चित रूप से अस्त-व्यस्त रहेगा। जितनी कुछ साधन सामग्री प्राप्त है वह सभी अपर्याप्त और दोषपूर्ण लगेगी।

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