श्रीराम से मिले हनुमान हुआ बालि वध
लखनऊ । सोमवार को लखनऊ शहर के ऐतिहासिक ऐशबाग रामलीला मैदान में चल रहे रामोत्सव 2025 के मंच पर चल रहे रामलीला में श्रीराम अपनी भार्या सीता को खोजते हुए माता शबरी के आश्रम में पहुंचते है जो ऋषि मतंग से ज्ञान प्राप्त कर अपने जीवन को श्रीराम की प्रतीक्षा में व्यतीत कर रही थीं । यहाँ शबरी ने उन्हें अपने चखे हुए मीठे बेर खिला कर अपने प्रभु का स्वागत करती हैं व उन्हे सुग्रीव व हनुमान से मिलने का सुझाव देती हैं । माता शबरी की भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीराम उन्हें मोक्ष प्रदान कर आगे बढते हैं ।
जहाँ उनकी भेंट अपने परम भक्त हनुमान से होती है प्रभु सुग्रीव से मिलने की इच्छा प्रकट करते हैं । सुग्रीव को उसके भाई बाली ने धोखे से राज्य और पत्नी से बेदखल कर दिया था, जिस कारण वे ऋष्यमूक पर्वत पर शरण लेकर रह रहे थे यहीं हनुमान जी श्रीराम को सुग्रीव से मिलाते हैं और राम उन्हे अपना मित्र बनाते हुए उनकी सहायता करने की घोषणा करते हैं ।
इसके बाद श्रीराम के हाथों बालि का वध किया जाता है मृत्यु शैया पर पड़े बालि अपने पुत्र अंगद को श्रीराम की शरण में रहने का ज्ञान दे मृत्यु को प्राप्त होता है । सांस्कृति मंच पर एलाइट डांस अकादमी द्वारा घर मेरे परदेसिया, राम सियाराम, रावण रावण, रक्तचरित व अलबेला सजन आयो रे पर आर्यन, हर्ष, कृतिका, तृष्नवी, डॉली, प्रकाश, आर्यन, अनन्त, दिव्यांशु, महक व दिव्या ने अपनी नृत्य प्रतिभा से सजाया। इसके उपरांत कथक नृत्य नाटिका रामायण द्वारा श्रीराम जन्म से रावण वध तक की संपूर्ण कथा को कथक नृत्य के अभिनय पक्ष द्वारा अनीश रावत ,प्रखर मिश्रा, अपर्णा शुक्ला, सिमरन कश्यप, आरोही चौधरी ,अंशिका कटारिया, सपना सिंह, वैष्णवी सक्सेना ,आदित्य गुप्ता, विकास अवस्थी एवं डॉ आकांक्षा श्रीवास्तव ने प्रस्तुत किया । नृत्य नाटिका की अवधारणा प्रशिक्षण एवं नृत्य निर्देशन अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कथक नृत्यांगना एवं गुरु डॉ. आकांक्षा श्रीवास्तव द्वारा किया गया। ऐशबाग श्री रामलीला समिति के अध्यक्ष हरिशचन्द्र अग्रवाल ने बताया की मंगलवार को अशोक वाटिका में सीता और रावण संवाद से लेकर लंका दहन तक की कथा का मंचन किया जाएगा ।
महानगर रामलीला में सीता हरण का हुआ शानदार मंचन
सुनहुँ देव रघुवीर कृपाला, एहिं मृग कर अति सुन्दर छाला…,
लखनऊ। श्री रामलीला समिति महानगर की ओर से चल रहे रामलीला महोत्सव के चौथे दिन राम लक्ष्मण और सीता जी वन गमन के पश्चात चित्रकूट पहुंचते हैं और इधर अयोध्या में भरत और शत्रुघ्न अपनी ननिहाल से अयोध्या पहुंचते हैं और जब भारत जी को पता चलता है कि उनकी मां कैकई के कारण उनके बड़े भाई राम जी भाभी सीता जी और भ्राता लक्ष्मण को वनवास जाना पड़ता है और उनके वियोग में उनके पिता का देहांत हो जाता है वह अपनी माता से कहते हैं तेरे मन में ऐसी कुमति बसी क्यों राम को वन दीन्हाँ कैकेयी कहती है कि हे पुत्र अब शोक का त्याग करो और राजकाज सँभालो ! तो भरत कहते हैं यह बड़ो अनरथ कीन्ह मेरी माता। भरत जी विलाप करते हुए कहते है बिना रघुनाथ के देखे, नहीं दिल को करारी है और अपने भ्राता और माता सीता को लेने वन को चल देते हैं। वन में गुरु वशिष्ठ के साथ अपने परिजनों को देखकररामचंद्र जी लक्ष्मण जी और सीता जी आश्चर्यचकित होते हैं। फिर फिर प्रभु रामचंद्र जी गुरु वशिष्ठ से पूछते हैं
हे गुरुवर। आपके दर्शनों से कृतार्थ हुआ। पूज्य पिताजी कुशल से तो हैं। वशिष्ठ: हे राघव ! तुम्हारे विरह के दु:ख में राजा का स्वर्गवास हो गया है ! यह खबर सुनकर रामचंद्र जी व्याकुल हो जाते हैं फिर भरत की उनसे वापस अयोध्या लौटने की जिद करते हैं और कहते हैं कि आपकी जगह में 14 वर्ष तक वनवास में रहूंगा लेकिन उनके आग्रह को रामचंद्र जी अस्वीकार कर देते हैं और उनसे वापस अयोध्या लौटने के लिए कहते हैं तब भरत जी उन से कहते हैं कि आप अपनी चरण पादुका मुझे दे दे मैं उन्हें राजगद्दी में रखकर राजकच का संचालन करूंगा तब प्रभु रामचंद्र जी उन्हें अपनी चरण पादुका दे देते हैं। वन में घूमते हुए रावण की बहन सूर्पनखा पहुंचती है और राम लक्ष्मण को देखकर कहती है। आह्हा कितने सुन्दर राजकुमार हैं। धिक्कार है मेरे भाई रावण को जो ऐसे किशोरों के होते हे मुझे अब तक कुँवारी रहने दिया। सूर्पणखा(राम से तुम सम पुरुष न मो सम नारी, यह संजोग विधि रचा विचारी। राम जी कहते हैं सुन सुन्दरी मोरी यह बाता अहइ कुमार मोर लघु भ्राता देखि तुम्हहिं अति सुन्दर नारी,अवसि लखन वर लेहिं कुमारी।
सूर्पणखा(लक्ष्मण के पास जाकर) प्रभु जी हमें ही वर लेओ ! हमे ही वर लेओ हमें ही वर लेओ। लक्ष्मण (गुस्से में) अरे निर्लज्ज तुझे वही ब्याहेगा जिसने तृण के सामान लज्जा को तोड़कर फेंक दिया हो और सूर्पनखा की की नाक को काट देते हैं। सूर्पनखा बौखलाते हुए अपने भाई खर और दूषण के पास जाती है और उनसे कहती है की जंगल में राजकुमार आए हैं जो अपने को अयोध्या के राजकुमार बता रहे हैं उनके साथ में एक की पत्नी सीता भी है उन्होंने मेरी यह दशा कर दिया है आप जैसे भाइयों के रहते हुए उनके यहां हिम्मत हो गई है भाई आप लोग कुछ करो और खर दूषण अपनी सेना के साथ वन को चल देते हैं। प्रभु राम कर और दूषण सहित राक्षसों की सेना का संघार कर देते हैं। फिर सूर्पनखा रोते और बिलखते हुए अपने भाई रावण के पास जाती है और रावण कहता है अरी मेरी बहना री बहना ! तू रोती-धोती क्यों कर आई ? सूर्पणखा अरे मेरे भइया रे भइया ! मैं तो नाक कटाकर आई ! वन में दो राजकुमार आए हैं उन्होंने मेरी यह दशा की है और खर दूषण का भी वध कर दिया है तब रावण एकांत में कहता है कि यह कोई साधारण मानव नहीं है लगता है ईश्वर ने मनुष्य का अवतार लिया है इसे आसानी से विजय प्राप्त नहीं की जा सकती है और वह अपने मामा मारीच जो चल करने में निपुण होता है के पास जाकर कहता है कि तुम कपाट मृग मानकर वन में जाओ पहले मामा मैरिज इनकार करता है लेकिन रावण के भाई दिखाने पर वह उसकी बात मानने को तैयार हो जाता है।
सीताजी स्वर्ण-मृग को देखकर, राम से सुनहुँ देव रघुवीर कृपाला, एहिं मृग कर अति सुन्दर छाला हे आर्य यह कैसा विचित्र मनोहर मृग है ! इसका चर्म अवश्य अति उत्तम होगा रामचंद्र जी सीता जी को समझते हैं कि जंगल कई मायावी लोग रहते हैं यह मृग हो सकता है मायावी हो लेकिन सीता जी के हट के आगे वह उस मृग के पीछे जाते हैं जब वह उसे तीर मारते हैं वह हाय लक्ष्मण हाय लक्ष्मण कहता है। उसे आवाज को सुनकर सीता जी व्याकुल हो जाती है और लक्ष्मण जी से कहती है कि तुम्हारे भाई किसी संकट में तुम तुरंत उनकी रक्षा के लिए जाओ पहले तो लक्ष्मण जी मना करते हैं अंतत: वह कुटिया के चारों ओर सुरक्षा रेखा बनाकर उसे दिशा में जाते हैं जिस दिशा में प्रभु राम मृग के पीछे गए थे लक्ष्मण जी के जाते ही रावण योगी का भेष बनाकर भिक्षा मांगने कुटिया में आता है और सीता जी से कहता है कि उसे रेखा से बाहर आकर दीक्षा दी सीता जी जैसे ही सुरक्षा रेखा से बाहर आती है और रावण उनका अपहरण कर लेता है रास्ते में जटायु जी रावण का रास्ता रोकने का प्रयास करते हैं और जटायु कहते हैं रे दशकंध कुमति तोहि आई, हरि परनारि लाज नहिं आई। तो रावण तलवार से जटायु जी के पंख काट देता है। राम का अभिनय यशी लोहुमी, लक्ष्मण का अभिनय फाल्गुनी लोहुमी, सीता का अभिनय अनुराधा मिश्रा, भरत का अभिनय प्रतिष्ठा शर्मा, शत्रुघ्न का अभिनय यशी शर्मा कैकई का अभिनय आशा रावत, मंथरा का अभिनय राधिका बोरा, गुरु वशिष्ठ का अभिनय हरीश उपाध्याय, सूर्पनखा का अभिनय हारशिला पांडे, खर का अभिनय पंकज त्रिपाठी दूषण का अभिनय राजेश त्रिपाठी, रावण का अभिनय भास्कर जोशी जोगी रावण का अभिनय कमल पंत और जटायु का अभिनय हरीश लोहुमी ने किया।
पंचवटी दृश्य देख भावविभोर हुए दर्शक
लखनऊ। सुन्दर नृत्य एवं भाव भंगिमाओं से सूर्पनखा श्रीराम को आकर्षित करने का प्रयत्न करती है लेकिन प्रभु राम उससे लक्ष्मण के पास जाने हेतु विनय करते हैं तो सूर्पनखा लक्ष्मण के पास जाती है। किन्तु लक्ष्मण सूर्पनखा से कहते हैं कि वह उसके जाल में फँसने वाले नहीं हैं और उसकी उद्दण्डता को देखते हुए सूर्पणखा की नाक काट लेते हैं। सेक्टर – “ए” सीतापुर रोड योजना कालोनी में चल रहे 33वें रामलीला के तीसरे दिन सोमवार को भगवान शंकर जी की आरती से मंचन का शुभारम्भ हुआ। कलाकारों ने केवट राम संवाद, भरत मिलाप, पंचवटी दृश्य, खरदूषण वध, सीताहरण, जटायु मरण के दृश्य का बखूबी मंचन किया। पंचवटी दृश्य का मंचन देख दर्शक भाव विभोर हो गये और करतल ध्वनि से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। वहीं जब इस बात की जानकारी रावण को होती है तो वह क्रोध में आकर माता सीता का हरण कर लेता है। सीता हरण से श्रीराम क्षुब्ध हो जाते हैं और विलाप करते हैं। तभी प्रभु श्रीराम की मित्रता हनुमान से होती है।





