शरीर शक्तियों का भण्डार है। शास्त्रकार ने तो यहां तक कहा यत् ब्रह्माण्ड तत् पिण्डे, जो कुछ इस ब्रह्माण्ड में है वह सब इस शरीर में है। सूर्य की अजस्र उष्णता और आलौकिक प्रकाश, चन्द्रमा की शीतलता, शून्य की विशालता, मेघों की क्षमता, लोक लोकान्तरों से प्रस्फुटित होने वाले अनन्त रहस्यों का केन्द्र है, यह मनुष्य शरीर। संभवत: समस्त सृष्टि में इतनी उपयोगी, इतनी शक्तिशाली, इतनी रहस्यमयी, इतनी सर्वांड्गपूर्ण वस्तु अन्य नहीं जितना कि यह मनुष्य की देह है।
अजब विलक्षणता भरी है परमात्मा ने इसमें। उन सम्पूर्ण शक्तियों का स्वामित्व मनुष्य को मिलजायेतो वह देवता बन जाये, भगवान बन जाये। इतना उपयोगी उपकरण होते हुए भी लोग अभाव का जीवन जीते हैं। इससे अधिक और कुछ विशेषता उनमें दिखाई नहीं देती यह आश्चर्य की बात है। इसका एक मात्र कारण मनुष्य की अज्ञानता है। पिता की गाड़ी हुई रकम घर में ही हो पर बेटे को उसका ज्ञान न हो तो वह धन उसके किस काम का?
परमात्मा ने मनुष्य को अनन्त अनुदान दिये हैं। शरीर रूपी तिजोरी में चक्रों, ग्रन्थियों, उपत्यिकाओं एवं नाड़ी-गुच्छकों आदि के रूप में ऐसे महत्वपूर्ण हीरे, जवाहरात भर कर दिये हैं कि वे मनुष्य को मिल जायें तो वह श्री सम्पन्न हो जाये, मालामाल हो जाये। मनुष्य उन शक्तियों को प्राप्त कर धन्य हो सकता है। महर्षि अरविन्द के अनुसार साधना का उद्देश्य शक्ति उपार्जित करना है।
ईश्वर के संसर्ग से अपनी आत्मा को पवित्र बनाकर और पाप से छुटकारा पाकर आध्यात्मिक विद्युत शक्ति से परिचालित होकर इसे संसार में प्रकाश फैलाने के लिए, उस ज्योति की किरणों को संसार से बांटने के लिए हमें आधर यंत्र डायनमो का काम करना होगा। जिस प्रकार एक ही सुरंग पूर्ण शक्ति युक्त होकर शब्द के साथ पर्वत माला को विदीर्ण कर देती है, उसी प्रकार ईश्वर की ज्योति से सम्पन्न होकर हमें संसार की सभी अशुद्धताओं और कुसंस्कारों को दूर करना होगा।
एक-एक मनुष्य साधना में सिद्धि होकर सैकड़ों और हजारों प्राणियों के बीच ज्ञान व शक्ति की ज्योति फैलाकर उसमें से अविद्या को दूर करेगा और उनका उद्धार करेगा। एक साधक की शक्ति के प्रकाश से सहस्रों जनधर्म में दीक्षित होंगे और सच्चिदानन्द के अगाध सागर में निमग्न होंगे। समाज के उद्धार का केवल एक ही मार्ग और एक ही उपाय है, जिसकी वह आज तक उपेक्षा करता आया है।
उस मार्ग का नाम है शक्ति साधना और आत्मोपलपब्धि। इसलिए हमें पुन: उसी मार्ग का अनुसरण करना होगा, उसी पथ पर लौटना होगा, जहां से हमें ईसा की पवित्रता, श्री चैतन्यदेव का प्रेम व आनन्द, परमहंस रामकृष्ण का संसार के सभी धर्मों का समन्वय तथा एकीकरण व सूक्ष्म मानवता की प्राप्ति होगी।





