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भौतिक प्रगति

साधना के मार्ग में हमे जो उपलब्धियां मिलती हैं उनकी तुलना किसी भौतिक प्रगति से नहीं की जा सकती है। आत्मिक प्रगति की उपलब्धियां भौतिक प्रगति की तुलना में असंख्य गुनी सामर्थ्य सम्पन्न और हर्षोल्लास से पूर्ण होती हैं। उन्हें प्राप्त कर सकना मानव जीवन की सबसे बड़ी और सबसे महान सफलता है। जो इस दिशा में बढ़ सका, समझना चाहिये हर दृष्टि से कृतकृत्य हो गया। इस मार्ग पर चलने के इच्छुक साधक को अनुभवी और सही मार्ग दर्शक की आवश्यकता अनिवार्य रूप से जुटानी पड़ती है।

साथ ही यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि कोई विदूषक गुरु पद का प्रहसन रचे न बैठा हो और अपने साथ-साथ अनुगमनकर्ता को भी न डुबा रहा हो। सही मार्ग दर्शन की तलाश में निकले हुए आत्म पथ के पथिक को जहां श्रद्धालु होना चाहिए वहां सतर्क भी।

अन्यथा इस धूर्तता के युग में किसी अहेरी के जाल में फंसकर प्रगति तो दूर जो पास में था उसे भी गंवा बैठेगा जिन्हें समर्थ, आत्मबल सम्पन्न और अनुभवी गुरु का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन मिल गया तो समझना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के लिए एक सशक्त अवलंबन प्राप्त हो गया। ऐसे गुरु न केवल शिष्य का साधनात्मक मार्गदर्शन करते हैं वरन अपनी शक्ति का एक अंश देकर साधक को आत्मबल से अुनग्रहीत करते हैं।

साधना ग्रंथों के अलंकारिक वर्णनों में उस आदान प्रदान की प्रक्रिया को ही शक्तिपात नाम से संबोधित किया गया है। गुरु द्वारा अपनी शक्ति को हस्तान्तरित करने, शक्तिपात द्वारा शिष्य की क्षमताओं को विकतिस करने की घटनाओं का उल्लेख योग ग्रंथों में अनेकों स्थानों पर मिलता है।

पहले योग मार्ग पर चलने, साधना पथ पर बढ़ने वाले प्रत्येक व्यक्ति एवं साधक के मन में यह जिज्ञासा उठती है कि शक्तिपात का स्वरूप दरअसल क्या है? उसकी प्रक्रिया क्या है? इस प्रक्रिया में वैज्ञानिकता का अंश कितना है। शक्तिपात की घटनाएं यदि सच हैं तो क्या प्रत्येक व्यक्ति ऐसे समर्थ व्यक्ति-व्यक्तियों महापुरुषों से अनुपम उपहार प्राप्त कर सकता है? यदि ऐसा संभव है तो उसका स्वरूप क्या है? सामान्य व्यक्ति इसकी परख किस प्रकार कर सकता है? आदि प्रश्न ऐसे हैं जो विचारणीय हैं।

साधना मार्ग की ओर उन्मुख हर साधक यह जानने का इच्छुक होता है। विवेकानन्द संचयन पुस्तक में उल्लेख मिलता है कि रामकृष्ण की अलौकिक शक्ति के संचार का अनुभव विवेकानन्द को हुआ है। उस अवधि में उन्हें दिव्य अनुभूतियां हुर्इं जो वर्णानातीत हैं। इसी प्रकार का प्रसंग योगानन्द के जीवन चरित्र आॅटोबायोग्राफी आॅफ एथोपी को पढ़ने पर भी मिलता है।

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