देव ऐसे होते हैं कि वे परमार्थ से प्रेम करते हैं। देव कहते हैं- दिव्य को, अलौकिक को, असाधारण को। हम देखते हैं कि साधारणत: दुनिया के सब लोग अपनी स्वार्थ पूर्ति में, अपनी कामनाओं की तृप्ति में लगे रहते हैं। उनकी इच्छा रहती है कि दूसरों से जो कुछ छीन सकें, ले सकें, ले लें। वह साधारण व्यक्ति हर किसी से लेने की इच्छा करते हैं, लेते हैं।
परन्तु वे असाधारण व्यक्ति जो अपनी शक्तियों, सामर्थ्यों को अपनी स्वार्थ पूर्ति, वासनाओं की तृप्ति और छल-कपट में न लगाकर परमार्थ के लिए अर्पण करते हैं उन्हें दूसरों की सेवा में लगाते हैं, सदैव देते रहने की इच्छा करते हैं, वे देवता हैं। देवता दिव्य होते हैं अथवा यों कहना चाहिए कि जिनकी भावनाएं इच्छा, आकांक्षाएं, दिव्य हों वे देवता हैं, देवता इस तरह नहीं सोचते जिस तरह दुनियादार आदमी सोचते हैं, वे वस्तुओं और घटनाओं को उस दृष्टि से नहीं देखते जिस दृष्टिकोण से दुनियादार लोग देखते हैं। उनके सोचने व देखने का तरीका भिन्न होता है।
दिव्य सिद्धान्तों को सामने रखकर उनके आधार पर अपने कर्तव्य का निर्णय करते हैं और जो कर्तव्य उन्हें जंच जाता है उसको बड़े प्रलोभन आकर्षण और आपत्ति या भय होने पर भी नहीं छोड़ते। कारण यह है कि साधारण लोगों की भांति उनकी तृप्ति और प्रसन्नता पदार्थों तक सीमित नहीं रहती, उनका दृष्टिकोण भिन्न होता है। वे अपने कर्तव्य को केन्द्र बिन्दु मानकर उसी में अपनी श्रेष्ठतम सद्भावनाओं, प्रसन्नताओं को केन्द्रीभूत करते हैं और उसमें रमण करते हुए सच्ची सुख शांति पाते हैं।
जिस स्तर पर साधारण लोग खड़े रहते हैं। वह उससे ऊंचे खड़े होते हैं, वह असाधारण परिणाम को अपनाते हैं। उनकी जीवन ज्योति लोगों से ऊंची उठी हुई होने के कारण अलौकिक कही जाती है। कहते हैं कि देवता स्वर्ग में रहते हैं और स्वर्ग पृथ्वी से ऊपर है। इसका तात्पर्य इतना ही है कि वे उस विचार लोग में विचरते हैं, जो स्वार्थ और संकीर्णता की तुच्छता से उतना ही ऊंचा है जितना पृथ्वी से स्वर्ग।
इसलिए देवताओं का लोक मनुष्य लोग से ऊपर माना जाता है। मान्यता बिलकुल सत्य है कि देवलोक में देवताओं को सब प्रकार का आनन्द ही आनन्द होता है। साधारण व्यक्ति कितना भी धन वैभव इकट्ठा करके भी उतना सुख प्राप्त नहीं कर सकते जितना कि देवताओं को स्वभावत: होता है। कारण स्पष्ट है कि भौतिक वस्तुएं आस्थायी एवं परिवर्तनशील होती हैं उनके उतार चढ़ाव के साथ-साथ हर्ष विषाद के आवेश उतरते रहते हैं।





