गायत्री मंत्र प्रधान है। उसमें शब्द शक्ति अवलम्बन लेकर तीन शरीरों में सन्निहित तीन शक्ति स्रोतों के साथ संबंध बनाया जाता है। निखिल ब्राह्माण्ड को तीन लोकों के रूप में विभाजित किया गया है। इनके साथ संबंध जोड़ने के लिए शब्द शक्ति का आश्रय लिया जा सकता है। मंत्र योग समस्त उपचार शब्द शक्ति पर आधारित है।
विज्ञान के छात्र जानते हैं कि ऊर्जा के अनेक विभाजनों में ताप ध्वनि और प्रकाश की तरंगों को प्रमुखता दी गयी है। इन तीन का रूपान्तर विभिन्न स्तर के परमाणुओं और जीव कोशों में होता रहता है। पदार्थ जगत में पांच तत्वों का और चेतन जगत में पांच प्राणों का आधिपत्य है। इन दोनों ही क्षेत्रों में गतिविधियां जिस ऊर्जा के बलबूते चलती रहती हैं उनमें से एक अति महत्वपूर्ण है-ध्वनि। इसी का आध्यात्म तत्वज्ञानी ऊंकार के रूप में अधिग्रहण करते हैं।
ऊंकार से भूभुव: स्व: तीन व्याहृत और इनमें से प्रत्येक के तीन-तीन निस्तृत होने पर नौ शब्द वाला, चौबीस अक्षरों वाली गायत्री का महामंत्र बन जाता है। सामान्यतया इस हंसवाहिनी, आदिशक्ति के रूप में सविता के मार्ग ब्रह्मर्वस्व में तथा महाप्रज्ञा का ध्यान-धारण में अपनाया और हृदयांगम किया जाता है। इतने पर भी यह मानकर चलना चाहिए कि गायत्री का तत्वज्ञान और प्रयोग विधान जिस धारा में प्रवाहित होता है, कि वह ब्रह्म विद्या शब्द परक है। मंत्र योग का रहस्य यही है उसकी समस्त व्यवस्था, शब्द शास्त्र के अन्तर्गत समझी समझायी जा सकती है।
आत्मा और परमात्मा के बीच संबंध बनाने के लिए साधनात्मक प्रयोजनों में शब्द शक्ति का ही प्रयोग करना पड़ता है। जप, स्तवन, कथा, मंत्रोच्चर, पाठ, कीर्तन, प्रवचन, आशीर्वाद, अभिचार आदि में शब्द का ही किसी न किसी रूप में प्रयोग होता है। नाद योग के माध्यम से ईश्वरीय संदेश सुनने एवं अदृश जगत में चल रही हलचलों की जानकारी प्राप्त करने की बात बनती है।
विज्ञान ने प्रकृति के अन्तराल से ऐसी ध्वनि तरंगें ढूंढ निकाली हैं जो अब तक के समस्त अविष्कारों की तुलना में अधिक सामर्थ्यवान शक्ति स्रोत उपलब्ध हुआ है। चेतना जगत तथा पदार्थ जगत के देनों ही क्षेत्रों में उच्च स्तरीय अनुकूलताएं उत्पन्न करने तथा अभीष्ट उपलपब्धियां प्राप्त करने के लिए शब्द शक्ति का जो विशेष विनियोग उपचार किया जाता है उसी को मंत्र कहते हैं। आज यंत्रों की धूम है।
उनकी उपयोगिता समर्थता का परिचय सभी को है। भूतकाल में ठीक इसी तरह मंत्र शक्ति का प्रयोग होता है और उसकी प्रभाव शक्ति आज के अति महत्वपूर्ण यंत्रों की तुलना में किसी भी प्रकार कम नहीं थी। मंत्र विद्या को उच्च स्तरीय शब्द विज्ञान कह सकते हैं।





