लोक कथा पर आधारित दुलारीबाई ने दर्शको को खूब हंसाया
लखनऊ। नाट्य संस्था आकांक्षा थियेटर आटर््स, लखनऊ द्वारा तैयार की गयी लोक कथा पर आधारित संगीत, गायन एवं वादन से सुसज्जित सुप्रसिद्ध नाट्य रचनाकार मणि मधुकर की नाट्य रचना दुलारीबाई का नाट्य मंचन बाल्मीकि रंगशाला में वरिष्ठ रंगनिर्देशिका अचला बोस के निर्देशन में मंचित किया गया। कार्यक्रम से पूर्व मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित डॉ. अनिल रस्तोगी मौजूद रहे। कथानक के अनुसार दुलारीबाई मणि मधुकर की संगीतमय सार्वकालिक फन्तासी और हिन्दी रंगजगत की श्रेष्ठ रचना है। गीत संगीत, हास्य तथा लोकरंगों से सरोबोर यह नाटक अपने चरित्रों, विचारों, कथ्य एवं भवव्यंजना की गहनता की दृष्टि से भी उत्कृष्ट है। दुलारीबाई इस नाटक की प्रधान नायिका है। इस नाटक की पूरी कहानी दुलारीबाई के इर्द-गिर्द घूमती है, दुलारी एक अविवाहित युवती है। दुलारीबाई के पास एक बहुत ही पुराना जूता है। जिसे पूर्व में दुलारी के दादा फिर पिता और अब उसी जूते को दुलारी स्वयं पहनती हें जिस गांव में वह रहती है उस गांव में उसके चाहने वाले भी कई हैं, जिनमें कल्लू भांड, सूत्रधार एवं चिमना मांझी इत्यादि है। इस नाट्यकृति का प्रारम्भ सूत्रधार एवं दुलारी की प्रेमकथा से होता है। सूत्रधार के जाने के पश्चात् दुलारीबाई के पास कल्लू भांड आता है यह भी दुलारी का प्रेम दिवाना है। दुलारीबाई जरूरत से ज्यादा कंजूस है। दुलारी के पास कटोरीमल इत्र बेचकर चला जाता है। इसके बाद फजीर्लाल एक आवारा किस्म का गुण्डा है जो दुलारीबाई को किसी मामले में फंसाकर उससे रूपया एेंठता है। आनाकानी करने पर दुलारी को गांव के सरपंच पटेल के पास ले जाता है जो दुलारी पर जुमार्ना ठोंकता है। इस प्रकार नाटक कई दिलचस्प घटनाओं से गुजरता हुआ एक ऐसे मोड़ पर पहुंचता है, जहां ईश्वर से दुलारी का एक वरदान प्राप्त होता है कि वह जिस चीज को छुयेगी वह सोने की हो जायेगी। नाटक के अन्त में कई विषम परिस्थितियों से गुजरते हुए दुलारी की शादी धोखे से कल्लू भांड से हो जाती है, तो दुलारी कल्लू भांड के साथ-साथ गंगाराम जाट को जो कि सरपंच का अंगरक्षक है उसे भी छूकर वह सोने का बना देती है और फिर फजीर्लाल भी सोने का बन जाता है। तदोपरान्त ईश्वर पुन: प्रकट होकर अपना वरदान वापस ले लेता है। यहीं पर उक्त नाट्यकृति का समापन होता है। इस नाटक में दुलारीबाई की प्रधान भूमिका में लखनऊ मंच की जानी-मानी अभिनेत्री जारा हयात (बुशरा फातिमा) ने किया, कल्लू भाड की भूमिका में संस्था के नाट्य गुरू अशोक लाल, फजीर्लाल की भूमिका में लखनऊ के वरिष्ठ रंगकर्मी तारिक इकबाल तथा गांव के सरपंच पटेल की भूमिका में वरिष्ठ रंगकर्मी प्रभात कुमार बोस तथा गंगाराम की भूमिका में आनन्द प्रकाश शर्मा, कटोरीमल की भूमिका में मोहित यादव के अतिरिक्त सूत्रधार प्रथम की भूमिका में विजय मिश्रा, सूत्रधार द्वितीय की भूमिका में कर्मेन्द्र सिंह गौर, सूत्रधार तीन की भूमिका में सचिन सिंह चैहान, सूत्रधार चार की भूमिका में अरूण कुमार, सूत्रधार-5 की भूमिका में सुब्रोतो बोस तथा सूत्रधार छ: की भूमिका में विजय वीर सहाय के साथ-साथ चिमना मांझी एवं ईश्वर की दोहरी भूमिका में अरूण कुमार विश्वकर्मा ने अपने-अपने सशक्त अभिनय से दर्शको को अपने माया जाल में बांधे रखा।





