साधना के लिए मन और शरीर दोनों को साधना पड़ता है। मानसिक परिष्कार के लिए योग और शारीरिक प्रखरता उभारने के लिए तप का आश्रय लेना पड़ता है। योग और तप की परिधि में अनेकों प्रकार के अभ्यासों और अनुशासनों का विधि विधान है। इसमें से कौन किसे अपनाये यह व्यक्ति विशेष की स्थिति का अतिरिक्त विश्लेषण करके ही यह तामेल बैठता है कि किस मन:स्थिति में किस साधना को परिस्थिति को हृदयांगम करना और व्यवहार में उतारना बन पड़ेगा।
सबके लिए एक जैसे निर्धारण नहीं हो सकते। एक कक्षा के बच्चों को तो एक पाठ्यक्रम का अभ्यास कराया जा सकता है, पर एक रोग के हर रोगी को एक जैसी चिकित्सा एवं परिचर्या नहीं बतायी जा सकती है। उसमें रोग इतिहास, रोग का कारण एवं रोगी की वर्तमान स्थिति का निदान विश्लेषण करना होता है। इसके उपरान्त ही कुशल चिकित्सक उपचार का निर्धारण करते हैं।
इसी प्रकार साधना के मोटे नियम तो हर साधक के लिए एक जैसे हो सकते हैं, पर व्यक्ति विशेष की आवश्यकता के अनुरूप विशेष परामर्श की विशेष मार्गदर्शन की विशेष देखभाल की जरूरत पड़ती है। अपनी स्थिति को आप समझ सकना कठिन है। इसलिए रोगी होने पर अच्छे डॉक्टर भी दूसरे डाक्टर बुलाते और उनके परामर्श अनुशासन में अपना इलाज चलाते हैं। साधना क्षेत्र में यही नीति अपननी होती है। न केवल स्थिति के अनुरूप साधना विशेष का चयन करना होता है वरन उस निर्धारण के लिए अनुभवी मार्गदर्शन का परामर्श अनुशासन भी उपलब्ध कराना होता है।
साधना क्षेत्र में गुरु वरण की आवश्यकता पर बहुत जोर दिया गया है। इसका प्रयोजन अपने उपचार के लिए अनुभवी चिकित्सक का सहयोग जुटाने जैसा है। छात्रों को आध्यापक की भी जरूरत पड़ती है। बाजार से पुस्तकें खरीद कर बिना किसी से पूछताछ किये अपने आप उत्तीर्ण होते रहना कठिन है। बच्चा अपने आप वर्णमाला और गिनती को पढ़ना लिखना बिना किसी सहयोग के किस प्रकार आरम्भ करें? संगीत शिल्प आदि में कोई एकाकी मात्र अपने ही प्रयास से कैसे प्रवीण बने?
भौतिक क्षेत्रों की तरह आत्मिक क्षेत्र में भी ऐसे उच्चस्तरीय मार्गदर्शक की आवश्यकता पड़ती है, जिसे न केवल विश्लेषण निर्धारण में प्रवीणता प्राप्त हो, वरन उस मार्ग पर लंबी यात्रा करने के उपरान्त जिसने अनुभव भी संपादित किया हो। अल्प प्राण महाप्रण से जुड़ने के लिए उपयुक्त मार्गदर्शक चाहिए। यह कार्य चिन्ह पूजा के लिए गुरु बनाने या शिष्य बनने की लकीर पीटने से सम्पन्न् नहीं होता, दोनों के बीच ग्रहण कर सकने की श्रद्धा और दे कसने की उदार क्षमता का समुचित अनुपात भी रहना चाहिए।





