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अकीदत के साथ निकला शाही जरीह का जुलूस, अजादारों की आंखें हुई नम

लखनऊ। अश्कबार आंखे, हाथों में अलम और जुबां पर या हुसैन की सदाओं के साथ पहली मोहर्रम को जब बड़े इमामबाड़े से शाही जरीह का जुलूस निकला तो अजादारों की आंखें नम हो गई। बारिश भी अजादारों के हौंसले पस्त नहीं कर सकी। सैकड़ों की संख्या में औरतें, बच्चे व बुजुर्ग शाही जरीह के जुलूस में शामिल होने के लिए बड़े इमामबाड़े पहुंचे। अजादार पानी में भीगते हुए जुलूस के साथ साथ चलते रहे, जो देर रात छोटे इमामबाड़े पर खत्म हुआ। बारिश की वजह से मोम से बनी शाही जरीह व अभ्रक के ताजियों को प्लास्टि से ढक दिया गया था ताकि बारिश में वह खराब न हो। साथ ही इस बार शाही जरीह पिछले साल से छोटी बनाई गई थी। पिछले साल 22 फुट की शाही जरीह बनी थी जो रूमी गेट में फंस गई थी। लिहाजा इस बार ट्रस्ट ने 15 फुट की जरीह बनवाई थी। बड़े इमामबाड़े से शाम 7 बजे निकले शाही जरीह के जुलूस में शहनाई पर मजलिसे गम है शाहे हुदा की, आज पहली है माहे अजा की, धुन बजी तो अजादारों की आंखों में आंसू आ गए। सोमवार को अवध के रिवायती अंदाज में शाही जरी का जुलूस निकाला गया। आगे-आगे शहनाई और नकारों पर मातमी धुनें बज रही थी तो पीछे पीएसी व होमगार्ड के जवान बैंड पर मातमी धुनें बजा रहे थे। जुलूस के बीच मार्सियाख्वान अपनी दर्द भरी आवाज में मदीने से इमाम हुसैन की रुखसत को बयान कर रहे थे, जिसे सुन कर लोग अश्कबार हो रहे थे। जुलूस के साथ चल रहे हाथी और ऊंट जुलूस के शाही होने की गवाही दे रहे थे। इमामबाड़े से निकला शाही जरीह का जुलूस अजादारी रोड होता हुआ देर रात छोटे इमामबाड़े पर समाप्त हुआ। जुलूस के आगे ताज, शेरे दहां, सूरज ओर चांद से सजे हुए 5 हाथी और एक दर्जन ऊंट पर लोग हाथों में काले झंडे लेकर चल रहे थे। उसके पीछे मातमी बैंड, चोबदार, आलम जनाबे अब्बास लिए लोग या हुसैन की सदाएं बुलंद कर रहे थे। सबसे पीछे मोम की शाही जरी थी। जुलूस के बीच मार्सिया खान कर्बला में इमाम हुसैन पर हुए जुल्म पर मार्सियाख्वानी कर रहे थे। जैसे ही उन्होंने मार्सिया… बेकसो बेवतनों साबिरो शाकिर आए। हक पर मरने के लिए दीन के नासिर आए। दश्ते गुरबत में जो यसरब के मुसाफिर आए। गुरबते अहमदे मुरसल के मुजाबिर आए। पढ़ना शुरू किया तो अजादारों की आंखों में आंसू आ गए। वहीं, अजादारों ने शाही जरी और अलम की जियारत की और इमाम को पुरसा दिया।
जुलूस में दूर दराज से आए अजादारों के लिए कई लोगों ने चाय और पानी की सबीलों को भी इंतजाम किया था। इसमें आसिफदौला पार्क से लेकर घंटाघर और छोटे इमामबाड़े तक कई चाय पानी और तबरुक की सबीले लगाई गई थी। इसके अलावा हुसैनाबाद ट्रस्ट की ओर से भी जुलूस में चाय व पानी की सबील की गई। वहीं, बड़े इमामबाड़े से छोटे इमामबाड़े तक लगे कोबोल पथ्तरों की वजह से भी अजादारों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा।

हाथों में अलम लेकर निकले लोग
जुलूस में 22 फिट की मोम और 17 फिट की अभ्रक की जरीह मुख्य आकर्षक का केंद्र थी। अश्कबार आंखे, हाथों में अलम और लबों पर या हुसैन की सदाओं के साथ पहली मोहर्रम को जब बड़े इमामबाड़े से शाही जरीह का जुलूस निकला तो अजादारों की आंखें नम हो गईं। हजारों की संख्या में औरतें, बच्चे व बुजुर्ग शाही जरीह के जुलूस में शामिल होने के लिए बड़े इमामबाड़े पहुंचे। शाही जरीह का जुलूस के आगे शहनाई और नकारों पर मातमी धुनें बज रही थी। तो पीछे पीएसी व होमगार्ड के जवान बैंड पर मातमी धुनें बजा रहे थे। जुलूस के बीच मार्सियाख्वान अपनी दर्द भरी आवाज में मदीने से हजरत इमाम हुसैन अ.स। की रुखसत को बयान कर रहे थे।

जगह-जगह सबीले लगाई गईं
जुलूस के साथ चल रहे हाथी और ऊंट जुलूस के शाही होने की गवाही दे रहे थे। शाही जरीह का जुलूस अजादारी रोड होता हुआ देर रात छोटे इमामबाड़े पर समाप्त हुआ। जुलूस के आगे सबील, माहे मरातिब ताज, सूरज और चांद से सजे हुए हाथी और ऊंट पर लोग हाथों में काले झंडे लेकर चल रहे थे। सबसे पीछे मोम और अभ्रक की शाही जरीह थी। वहीं, अजादारों ने शाही जरीह और अलम की जियारत की और कर्बला के शहीदों को को पुरसा दिया। जुलूस में दूर दराज से आए अजादारों के लिए कई लोगों ने चाय और पानी की सबीलों को भी इंतजाम किया था।

अजादारी और फर्शे अजा की अहमियत पर खिताब
इमामबाड़ा गुफरान मआब में मुहर्रम की पहली मजलिस को खिताब करते हुए मौलाना ने अजादारी और फर्शे अजा की अहमियत और अजमत पर खिताब किया। मौलाना ने मजीद कहा कि मौजूदा तर्जे जाकिरी का आगाज इसी अजा खाने से हुआ, जिसकी तारीख मुरत्तब कर दी गयी है। मौलाना ने अहादीसे अइम्मा अ.स। की रौशनी में फर्शे अजा की अहमियत को वाजेह करते हुए कहा कि मजलिसे अजा के 14 नाम इमाम जाफर सादिक अ.स। ने बतलाये हैं, जिनसे फर्शे अजा की अजमत का पता चलता है। इस मजलिसे हुसैन अ.स। को मलाइका के नुजूल की जगह, दुरूद का मकाम और मैदाने अराफात से ताबीर किया गया है। मजलिस के आखिर में मौलाना ने सफीर-ए-इमाम हुसैन अ.स। हजरत मुस्लिम बिन अकील अ.स। की कूफा में शहादत का जिक्र किया।

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