लखनऊ। शक्ति की उपासना के लिए नवरात्र का समय सर्वोत्तम माना जाता है। हर साल अक्टूबर से नवंबर के महीने में शारदीय नवरात्रि पड़ती है। इस साल भी सभी को माता दुर्गा देवी के आगमन का बेसब्री से इंतजार है। माता दुर्गा को समर्पित शारदीय नवरात्रि के 9 दिनों में देवी की विधिवत आराधना की जाती है। श्रद्धा और विश्वास के साथ मां दुर्गा की उपासना करने से भक्तों को समृद्धि, बल, शांति और पॉजिटिव ऊर्जा प्राप्त होती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि शुरू होगी, जिसका समापन 20 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ होगा।
किस दिन किस देवी की पूजा होगी?
11 अक्टूबर: मां शैलपुत्री
12 अक्टूबर: मां ब्रह्मचारिणी
13 अक्टूबर: मां चंद्रघंटा
14 अक्टूबर: मां कुष्मांडा
15 अक्टूबर: मां स्कंदमाता
16 अक्टूबर: मां कात्यायनी
17 अक्टूबर मां कालरात्रि
18 अक्टूबर: मां महागौरी
19 अक्टूबर: मां सिद्धिदात्री
माता की सवारी का महत्व
धार्मिक मान्यता है कि नवरात्र में मां दुर्गा अलग-अलग वाहनों पर सवार होकर पृथ्वी पर आती हैं और उसी के आधार पर साल के शुभ-अशुभ फल का संकेत मिलता है। इस वर्ष 11 अक्टूबर को कलश स्थापना होने के कारण मां दुर्गा हाथी (गज) पर सवार होकर आएंगी। धार्मिक मान्यता में हाथी पर मां का आगमन शुभ माना जाता है। इसे अच्छी वर्षा, सुख-समृद्धि और धन-धान्य में वृद्धि का प्रतीक माना गया है। वहीं, 20 अक्टूबर मंगलवार को विजयादशमी के दिन मां दुर्गा अपने पूरे परिवार के साथ मुर्गे (चरणायुध) पर सवार होकर प्रस्थान करेंगी। मान्यता के अनुसार मुर्गे पर मां की विदाई होने पर जनमानस में विकलता की स्थिति बनी रहने का संकेत माना जाता है। इस प्रकार मां का आगमन शुभ संकेत दे रहा है, जबकि प्रस्थान को लेकर धार्मिक मान्यताओं में सावधानी का संकेत बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रविवार और सोमवार को नवरात्रि प्रारंभ होने पर मां दुर्गा हाथी पर, शनिवार और मंगलवार को घोड़े पर, गुरुवार और शुक्रवार को डोली पर तथा बुधवार को नौका पर सवार होकर आती हैं। हाथी पर आगमन को अच्छी वर्षा, सुख-समृद्धि और धन-धान्य में वृद्धि का संकेत माना जाता है। घोड़े पर आगमन को युद्ध या अशांति की आशंका, नौका पर आगमन को मनोकामनाओं की पूर्ति तथा डोली पर आगमन को रोग एवं कठिन परिस्थितियों से जोड़कर देखा जाता है। रविवार और सोमवार को विजयादशमी होने पर मां दुर्गा भैंसे पर, शनिवार और मंगलवार को मुर्गे पर, बुधवार और शुक्रवार को हाथी पर तथा गुरुवार को नर वाहन पर प्रस्थान करती हैं। धार्मिक मान्यता में भैंसे पर प्रस्थान को शोक, मुर्गे पर जनमानस में विकलता, हाथी पर शुभ वर्षा तथा नर वाहन पर शुभ-सौख्य का संकेत माना गया है।
इस साल नवरात्रि में चित्रा नक्षत्र में होगी कलश स्थापना
शारदीय नवरात्र की तैयारियों के लिए पंडाल से लेकर मां दुर्गा की प्रतिमा बाजार में छाई हुई हैं। नवरात्र की तैयारी के लिए पूजा सामग्री बाजार में मिल रही है। इस बार नवरात्र 11 अक्टूबर से शुरू हो रहे हैं। इस बार नवरात्र में 11 अक्टूबर को चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग रहेगा। इस नक्षत्र में कलश स्थापना की जाएगी। चित्रा नक्षत्र में नवरात्रि शुभ माने जाते हैं। नवरात्रि का समापन नवमी के दिन होता है। बंगाल में दुर्गा पूजा प्रमुख मानी जाती है और गुजरात में गरबा किया जाता है। बंगाली दुर्गा पूजा के अनुसार 18 अक्टूबर को मुख्य अष्टमी व्रत और पूजा होगी। अष्टमी तिथि 19 अक्टूबर को सुबह 10:51 बजे तक रहेगी। इसके बाद नवमी शुरू होगी। 19 अक्टूबर को अष्टमी-नवमी के संधि काल में संधि पूजा, कन्या पूजन और नवमी हवन किया जाएगा। दशहरे पर रावण के पुतलों का दहन होता है।
घट स्थापना का अभिजित मुहूर्त क्या है
इस साल चित्रा नक्षत्र रात 10:32 बजे से लग रहा है और वैधृति योग भी रात 9:05 बजे तक है, ऐसे में इस योग में कलश स्थापना शुभ मानी जाएगी। घट स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 5:46 से 9:39 बजे तक रहेगा। वहीं अभिजित मुहूर्त सुबह 11:13 से 11:59 बजे तक बताया गया है।
11 से 20 अक्टूबर तक होगी देवी के नौ रूपों की आराधना
नवरात्र के दौरान श्रद्धालु मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा करेंगे। 11 अक्टूबर को मां शैलपुत्री, 12 को ब्रह्मचारिणी, 13 को चंद्रघंटा, 14 को कुष्मांडा और 15 अक्टूबर को स्कंदमाता की पूजा होगी। 16 अक्टूबर को मां कात्यायनी, 17 को कालरात्रि, 18 को महागौरी और 19 अक्टूबर को मां सिद्धिदात्री की आराधना होगी। 20 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ मां की विदाई होगी।
दुर्गा अष्टमी और महानवमी कब है?
इस बार दुर्गा अष्टमी 19 अक्टूबर, सोमवार को होगी। इसी दिन महानवमी का पर्व भी रहेगा। यानी भक्तों को अष्टमी और नवमी से जुड़े प्रमुख पूजा कर्म एक ही दिन करने पड़ सकते हैं। 19 अक्टूबर को संधि पूजा का भी विशेष महत्व रहेगा। दिल्ली के आसपास पंचांग गणना में इसका समय करीब सुबह 10:27 से 11:15 बजे तक बताया गया है। हालांकि संधि पूजा का स्थानीय समय स्थान के अनुसार थोड़ा बदल सकता है।
नवरात्रि में कलश स्थापना कैसे करें?
सबसे पहले पूजा वाली जगह को साफ करें। एक चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। इसके बाद मिट्टी के पात्र में जौ बोएं और उसके ऊपर कलश स्थापित करें। कलश में जल भरकर उसमें अक्षत, सुपारी और सिक्का डाल सकते हैं। कलश के मुंह पर आम या अशोक के पत्ते रखें और ऊपर नारियल रखें। इसके बाद मां दुर्गा का ध्यान करते हुए संकल्प लें। कलश स्थापना के बाद मां दुर्गा की पूजा करें और अखंड ज्योति जलाने की परंपरा हो तो उसे विधि के अनुसार प्रज्वलित करें।
नवरात्रि में किन बातों का ध्यान रखें?
नवरात्रि में पूजा की जगह की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। अगर अखंड ज्योति जला रहे हैं तो उसे ऐसी जगह रखें जहां उसके गिरने या आग लगने का खतरा न हो। व्रत रखने वाले लोग अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार भोजन करें। फलाहार में भी बहुत ज्यादा तला-भुना खाना लेने से बचना बेहतर है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि के दौरान सात्विक भोजन किया जाता है। मांसाहार, शराब और तामसिक भोजन से दूरी रखने की परंपरा है। कलश स्थापना के बाद नवरात्रि के नौ दिनों तक देवी की पूजा और पाठ किया जाता है। दुर्गा सप्तशती या देवी कवच का पाठ करने वाले श्रद्धालु संकल्प के अनुसार उसका पाठ पूरा कर सकते हैं।
विजयदशमी कब होगी?
20 अक्टूबर 2026, मंगलवार को विजयदशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा। इसी दिन नवरात्रि के नौ दिनों की पूजा के बाद विजयदशमी का पर्व आएगा। कई स्थानों पर इसी दिन दुर्गा प्रतिमा विसर्जन भी किया जाएगा।




