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पारम्परिक लोककला सांस्कृतिक उत्सव में जीवंत हुई गंगा-जमुनी तहजीब

पारम्परिक लोककला सांस्कृतिक उत्सव का भव्य आयोजन
लखनऊ। सेंट्रल नोडल एजेंसी उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, प्रयागराज एवं संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली के सहयोग से लोक संस्कृति फाउंडेशन, लखनऊ द्वारा मोहन सिंह बिष्ट सभागार, उत्तराखण्ड महापरिषद भवन, कुर्मांचल नगर, लखनऊ में गंगा-जमुनी संस्कृति पर आधारित पारम्परिक लोककला सांस्कृतिक उत्सव का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम में गंगा-जमुनी तहजीब, भारतीय लोक संस्कृति, कला एवं सामाजिक सौहार्द की अद्भुत झलक देखने को मिली। कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य अतिथि भारखण्डे संगीत संस्थान की पूर्व कुलपति सम्मानित डा0 पूर्णिमा पाण्डेय एवं अन्य अतिथियों के द्वारा दीप प्रज्ज्वलन कर किया गया। सभागार में उपस्थित कलाकारों, साहित्यकारों एवं दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ अतिथियों का स्वागत किया। संस्था के अध्यक्ष श्री दिलीप शुक्ला एवं महामंत्री महेन्द्र सिंह गैलाकोटी द्वारा मुख्य एवं अन्य विशिष्ट अतिथियों को माल्यार्पण एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। अपने स्वागत संबोधन में महामंत्री श्री महेन्द्र सिंह गैलाकोटी ने कहा कि भारत की वास्तविक पहचान उसकी सांस्कृतिक एकता, विविधता एवं लोक परम्पराओं में निहित है तथा गंगा-जमुनी संस्कृति हमारी साझी विरासत का सबसे सुंदर उदाहरण है। कार्यक्रम का आरम्भ पारम्परिक शास्त्रीय संगीत पर आधारित गणपति वन्दना से हुआ, जिसने सम्पूर्ण वातावरण को भक्तिमय एवं सांस्कृतिक रंगों से भर दिया। इसके उपरान्त प्रस्तुत की गयी गंगा-जमुनी संस्कृति पर आधारित भव्य नृत्य नाटिका ह्लगंगा-जमुनी तहजीबह्व् कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रही। नृत्य नाटिका में यह संदेश अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया कि गंगा और जमुना की तरह भारत की विभिन्न संस्कृतियाँ अलग-अलग होते हुए भी एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। नृत्य नाटिका के संवाद एवं प्रस्तुति में यह भाव विशेष रूप से उभरकर सामने आया कि जहाँ मंदिरों की आरती और मस्जिदों की अजान मिलकर प्रेम, भाईचारे एवं सद्भाव का संदेश देती हैं, वहीं भारत की संस्कृति विश्व को एकता एवं मानवता का मार्ग दिखाती है। जहाँ प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है, जैसी भावनात्मक पंक्तियों ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। विशाल गुप्ता एवं श्री अरुण सोनकर के निर्देशन एवं श्री महेन्द्र गैलाकोटी के नेतृत्व में प्रस्तुत इस नृत्य नाटिका में कत्थक, सूफी एवं कव्वाली का अद्भुत समन्वय देखने को मिला। कलाकारों की जीवंत अभिनय शैली, आकर्षक वेशभूषा एवं मधुर संगीत ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। दर्शकों ने कई बार तालियों की गड़गड़ाहट से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। कार्यक्रम में सुश्री दिब्या शुक्ला के नेतृत्व में प्रस्तुत अवधी लोकगीत- रैलिया बैरन पिया को लिए जाय रे, भोजपुरी लोकधुन, विरहा, राजस्थानी घूमर- केसरिया बालम आओ री आदि लोक नृत्यों ने दर्शकों का मन मोह लिया। श्री शुभम द्वारा कैसे खेलु जैबु सावन गाने में कजरी नृत्य प्रस्तुत किया गया। इसके अतिरिक्त कालबेलिया नृत्य- मत बाउर परिया जीरौ तथा उत्तराखण्ड की समृद्ध लोकनृत्य – पायलिया तेरी छम-छम बाजली ने भी दर्शकों की खूब पसन्द आया। राजस्थान, उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखण्ड की लोक परम्पराओं का समावेश कार्यक्रम को और अधिक रंगारंग एवं सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बना रहा था। पूरा सभागार लोक संस्कृति के रंगों से सराबोर दिखाई दे रहा था। कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों ने लोक संस्कृति फाउंडेशन की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन समाज में सांस्कृतिक जागरूकता, सामाजिक समरसता एवं राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में गंगा-जमुनी संस्कृति जैसे विषयों पर आधारित कार्यक्रम समाज में सौहार्द एवं भाईचारे का संदेश देने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। कार्यक्रम के अंत में संस्था के अध्यक्ष श्री दिलीप शुक्ला ने सभी अतिथियों, कलाकारों, सहयोगियों एवं दर्शकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि लोक संस्कृति एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण हेतु भविष्य में भी ऐसे आयोजन निरंतर किये जाते रहेंगे।

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